---Advertisement---

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धर्म को श्रेष्ठ बताना अपमान, याचिका खारिज

By Muskan Thakur

Published :

Follow

Join WhatsApp

Join Now

सोशल संवाद/डेस्क : प्रयागराज स्थित Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में धर्म और अभिव्यक्ति की सीमाओं को लेकर बड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने धर्म को ही एकमात्र सत्य बताना न केवल गलत है, बल्कि यह अन्य धर्मों के अनुयायियों के प्रति अपमानजनक भी माना जा सकता है।

ये भी पढे : सफ वेलफेयर सोसाइटी कार्यालय का उद्घाटन, समाज सेवा को नई दिशा देने का संकल्प

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Saurabh Srivastava की एकल पीठ ने उस समय की, जब उन्होंने एक याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।

मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़ा है, जहां याची के खिलाफ आरोप है कि उन्होंने अपने धर्म को ही सर्वोच्च बताते हुए अन्य धर्मों, विशेषकर हिंदू धर्म के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। इस पर पुलिस ने उनके खिलाफ IPC Section 295A के तहत मामला दर्ज किया था, जो किसी धर्म या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से संबंधित है।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्हें झूठे आरोपों में फंसाया गया है और उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं। उनके वकील ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त जांच और न्यायिक विवेक के मामले का संज्ञान लिया। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि उनके बयान से किसी भी तरह का आपराधिक अपराध नहीं बनता।

हालांकि, राज्य सरकार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि मामले में कई तथ्यात्मक विवाद हैं, जिनका समाधान केवल विस्तृत साक्ष्य और सुनवाई के बाद ही संभव है। सरकार का पक्ष था कि प्रारंभिक स्तर पर यह स्पष्ट है कि मामला जांच और ट्रायल के योग्य है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि IPC Section 295A विशेष रूप से उन मामलों पर लागू होती है, जहां किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी धर्म या उसके अनुयायियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई जाती है। इस स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, न कि साक्ष्यों की गहराई में जाकर जांच करना।

इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की विविधता और धार्मिक सहिष्णुता को बनाए रखना बेहद जरूरी है। किसी एक धर्म को सर्वोच्च बताकर अन्य धर्मों को कमतर दिखाना समाज में विभाजन और तनाव पैदा कर सकता है।

अदालत के इस फैसले को धार्मिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह निर्णय यह संदेश देता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ दूसरों की आस्था का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है। अब यह मामला ट्रायल कोर्ट में आगे बढ़ेगा, जहां साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। वहीं, इस फैसले के बाद देशभर में धर्म और अभिव्यक्ति की सीमाओं को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है।

YouTube Join Now
Facebook Join Now
Social Samvad MagazineJoin Now
---Advertisement---

Exit mobile version