सोशल संवाद / डेस्क : Jamshedpur के साकची स्थित Motilal Nehru Public School में शुक्रवार से दो दिवसीय राष्ट्रीय नदी-पर्वत सम्मेलन 2026 की शुरुआत हुई। इस सम्मेलन का आयोजन Tarun Bharat Sangh, IIT ISM Dhanbad, Nature Foundation, Swarna Rekha Kshetra Vikas Trust, Jal Biradari और MissionY के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य देश में नदियों और पहाड़ों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए एक ठोस और प्रभावी कानून बनाने की दिशा में विमर्श करना है।

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जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने उठाए बड़े सवाल
कार्यक्रम में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एवं “जलपुरुष” के नाम से प्रसिद्ध Rajendra Singh ने कहा कि पिछले 77 वर्षों में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर कई कानून बनाए गए, लेकिन नदियों और पहाड़ों को वास्तविक सुरक्षा देने वाला सशक्त कानून अब तक नहीं बन पाया।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 41 केवल इंसानों ही नहीं बल्कि पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और प्रकृति की रक्षा की भी जिम्मेदारी तय करते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि आज प्रकृति का दोहन नहीं बल्कि शोषण हो रहा है और इसकी कोई सीमा नहीं बची है।
राजेंद्र सिंह ने कहा कि यदि देश को पानी बचाना है तो पहाड़ों और नदियों को हर हाल में संरक्षित करना होगा। उन्होंने अरावली पर्वतमाला से जुड़ी अपनी कानूनी लड़ाई का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से हजारों खदानों को बंद कराया जा सका।
नदी और पर्वतों के लिए विशेष कानून जरूरी: वी. गोपाला गौड़ा
सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश V Gopala Gowda ने कहा कि आजादी के 77 साल बाद भी देश में नदियों और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए अलग कानून नहीं बन पाया है। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से इस विषय पर विशेष ध्यान देने और संसद का विशेष सत्र बुलाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कानून नहीं बना तो आने वाली पीढ़ियों के लिए नदियों और पर्वतों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
स्वर्णरेखा नदी की स्थिति पर बोले सरयू राय
Saryu Roy ने कहा कि झारखंड समेत देशभर में नदियों और पहाड़ों की स्थिति लगातार खराब हो रही है। उन्होंने कहा कि कभी जमशेदपुर की बस्तियों का जीवन Subarnarekha River से जुड़ा हुआ था, लेकिन अब नदी का जल प्रदूषित हो चुका है।
उन्होंने साहिबगंज समेत झारखंड के कई इलाकों में पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई पर चिंता जताते हुए कहा कि बिना सशक्त कानून के प्राकृतिक संसाधनों को बचाना संभव नहीं है।
पर्यावरणविदों ने जताई चिंता
प्रख्यात पर्यावरणविद Dinesh Mishra ने कहा कि नदियों को संसाधन नहीं बल्कि मां के रूप में देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इंसानों ने प्रकृति के साथ संतुलन खो दिया है और असीमित दोहन ने पर्यावरण संकट को गंभीर बना दिया है।
वहीं Bolishetty Satyanarayana ने युवाओं से आगे आकर जल और जंगल बचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि पहाड़ खत्म होंगे तो बारिश और जल स्रोत भी प्रभावित होंगे।
तकनीकी सत्र में उठे पर्यावरणीय मुद्दे
सम्मेलन के तकनीकी सत्र में कई विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने नदियों और पहाड़ों की बिगड़ती स्थिति पर चिंता जताई। वक्ताओं ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े कई कानून होने के बावजूद उनका प्रभावी पालन नहीं हो पा रहा है।
विशेषज्ञों ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की कार्यप्रणाली, नदियों में बढ़ते प्रदूषण, अवैध खनन और जंगलों के विनाश जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की।
युवाओं की बड़ी भागीदारी
सम्मेलन में जमशेदपुर और आसपास के कॉलेजों से 300 से अधिक छात्र-छात्राओं और युवाओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संरक्षण को लेकर युवाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
इस अवसर पर Rajendra Singh ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के बड़े आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो सत्ता नहीं बल्कि समाज और प्रकृति के हित को प्राथमिकता दे।
दूसरे दिन भी जारी रहेगा सम्मेलन
राष्ट्रीय नदी-पर्वत सम्मेलन का दूसरा और अंतिम दिन 23 मई को आयोजित होगा। समापन सत्र में विभिन्न विशेषज्ञ नदियों और पर्वतों के संरक्षण के लिए प्रस्तावित कानून के मसौदे और सुझावों पर चर्चा करेंगे।










