Jharkhand Flood Plain Zoning Act 2026: नदी किनारे निर्माण पर सख्ती

By Tamishree Mukherjee

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Jharkhand Flood Plain Zoning Act 2026

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सोशल संवाद / डेस्क : झारखंड में नदियों के किनारे अवैध निर्माण, जमीन भरने और कचरा डालने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने की तैयारी की जा रही है। राज्य सरकार के प्रस्तावित झारखंड फ्लड प्लेन जोनिंग एक्ट-2026 का उद्देश्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को व्यवस्थित करना, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को सुरक्षित रखना और बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करना है। इस प्रस्ताव के तहत बाढ़ के खतरे के आधार पर क्षेत्रों को अलग-अलग जोन में बांटने और वहां निर्माण तथा औद्योगिक गतिविधियों को नियंत्रित करने की योजना है।

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मसौदे में नदी के प्राकृतिक किनारे से 100 मीटर तक नये स्थायी निर्माण पर सीमांकन पूरा होने तक अंतरिम रोक लगाने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसके अलावा नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों और कंपनियों पर आर्थिक दंड तथा गंभीर मामलों में जेल की सजा का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है।

हालांकि, ये प्रावधान मसौदे में प्रस्तावित हैं। इनके अंतिम स्वरूप, लागू होने की तारीख और संबंधित क्षेत्रों पर प्रभाव की पुष्टि आधिकारिक अधिसूचना के आधार पर की जानी चाहिए।

क्या है Jharkhand Flood Plain Zoning Act 2026?

झारखंड फ्लड प्लेन जोनिंग एक्ट-2026 का प्रस्ताव बाढ़ प्रभावित इलाकों में जमीन के इस्तेमाल और निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित करने से जुड़ा है। नदियों में बाढ़ आने के दौरान पानी को फैलने के लिए प्राकृतिक जगह की जरूरत होती है। यदि नदी के किनारे अंधाधुंध निर्माण, मिट्टी भरने, अतिक्रमण या कचरा जमा करने से यह जगह कम हो जाती है, तो आसपास के क्षेत्रों में जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

प्रस्तावित कानून के जरिए बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान कर वहां होने वाले विकास कार्यों के लिए नियम निर्धारित करने की योजना है। इसके अंतर्गत आवासीय निर्माण, औद्योगिक प्रतिष्ठान, खनन गतिविधियां, जमीन भरना और कचरा निस्तारण जैसी गतिविधियों पर क्षेत्र की संवेदनशीलता के अनुसार प्रतिबंध या शर्तें लगाई जा सकती हैं।

इसका मुख्य उद्देश्य नदी के प्राकृतिक जल प्रवाह, जल संग्रहण क्षमता और बाढ़ के पानी के फैलाव के लिए उपलब्ध स्थान को सुरक्षित रखना है।

बाढ़ के खतरे के आधार पर बनेंगे तीन जोन

मसौदे में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को तीन श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव है। इन जोन में निर्माण और दूसरी गतिविधियों की अनुमति बाढ़ के संभावित खतरे तथा क्षेत्र की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर तय की जा सकती है।

1. प्रोटेक्टेड जोन (Protected Zone)

यह सबसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए प्रस्तावित श्रेणी है। यहां बाढ़ के पानी के प्राकृतिक फैलाव और नदी के प्रवाह को सुरक्षित रखना प्राथमिकता होगी। ऐसे क्षेत्रों में स्थायी निर्माण और ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने का प्रस्ताव है, जो बाढ़ के पानी के रास्ते में बाधा बन सकती हैं।

2. रेगुलेटरी जोन (Regulatory Zone)

इस श्रेणी में आने वाले क्षेत्रों में निर्माण और विकास कार्यों पर निर्धारित शर्तें लागू हो सकती हैं। किसी परियोजना को अनुमति देने से पहले बाढ़ के जोखिम, जल निकासी और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जा सकता है। गतिविधियों की अनुमति संबंधित नियमों और निर्धारित शर्तों पर निर्भर करेगी।

3. वार्निंग जोन (Warning Zone)

यह उन क्षेत्रों के लिए प्रस्तावित श्रेणी है जहां बाढ़ के संभावित खतरे को ध्यान में रखते हुए लोगों और निर्माणकर्ताओं को सतर्क करने की जरूरत होगी। यहां जमीन के इस्तेमाल और निर्माण से संबंधित शर्तें निर्धारित की जा सकती हैं, ताकि भविष्य में बाढ़ के दौरान होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

इन तीनों जोन की वास्तविक सीमाएं और उनमें लागू होने वाले नियम अंतिम अधिसूचना तथा क्षेत्रवार सीमांकन पर निर्भर करेंगे।

नदी किनारे 100 मीटर तक नये निर्माण पर क्या होगा नियम?

प्रस्तावित मसौदे का एक अहम प्रावधान नदी और जलधाराओं के आसपास निर्माण से संबंधित है। इसके अनुसार, बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन के लिए अधिसूचना जारी होने के बाद अंतिम सीमांकन पूरा होने तक नदी के प्राकृतिक किनारे से जमीन की ओर 100 मीटर तक नये स्थायी निर्माण पर अंतरिम रोक लगाने का प्रस्ताव है।

इस प्रावधान का उद्देश्य सीमांकन की प्रक्रिया के दौरान ऐसे निर्माण को रोकना है, जो भविष्य में बाढ़ के पानी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित कर सकता है।

यह समझना जरूरी है कि प्रस्तावित 100 मीटर की रोक को सभी नदियों के लिए पहले से लागू स्थायी प्रतिबंध नहीं माना जाना चाहिए। इसका दायरा और प्रभाव संबंधित अधिसूचना, नदी की पहचान तथा सीमांकन की प्रक्रिया के अनुसार स्पष्ट होगा।

जमीन भरने और कचरा डालने पर भी होगी सख्ती

नदी के किनारे मिट्टी भरकर जमीन का स्तर बढ़ाना, जल निकासी के रास्ते बंद करना और कचरा डालना बाढ़ के खतरे को बढ़ा सकता है। इसी वजह से प्रस्तावित कानून में ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण की व्यवस्था शामिल की गई है।

मसौदे के अनुसार, बाढ़ क्षेत्र में भूमि भरने, जमीन को पुनः प्राप्त करने, कचरा निस्तारण और जल प्रवाह में बाधा डालने वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित करने या उन पर शर्तें लगाने का प्रस्ताव है।

गंभीर उल्लंघनों में नदी के प्रवाह को बाधित करना, जहरीला या खतरनाक कचरा डालना, प्रतिबंधित क्षेत्र में बड़े औद्योगिक अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाना और बाढ़ सुरक्षा से जुड़े उपकरणों को नुकसान पहुंचाना शामिल हो सकता है।

इन नियमों का उद्देश्य केवल निर्माण को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि बाढ़ से बचाव के लिए जरूरी प्राकृतिक और भौतिक व्यवस्थाओं को सुरक्षित रखना भी है।

नियम तोड़ने पर कितना लगेगा जुर्माना?

प्रस्तावित Jharkhand Flood Plain Zoning Act 2026 में व्यक्तियों और कंपनियों के लिए अलग-अलग जुर्माने का प्रावधान है। मसौदे के अनुसार, उल्लंघन की प्रकृति और गंभीरता के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है।

उल्लंघन करने वालाप्रस्तावित जुर्माना
व्यक्ति1 लाख से 2 लाख रुपये
व्यक्ति द्वारा उल्लंघन जारी रखने परप्रतिदिन 1,000 से 3,000 रुपये अतिरिक्त
कंपनी या कॉरपोरेट निकाय5 लाख से 10 लाख रुपये
कंपनी द्वारा उल्लंघन जारी रखने परप्रतिदिन 10,000 से 25,000 रुपये अतिरिक्त

ये रकम मसौदे में प्रस्तावित दंड के अनुसार हैं। अंतिम कानून में जुर्माने की राशि या शर्तों में बदलाव हो सकता है।

गंभीर उल्लंघन पर जेल की सजा का भी प्रस्ताव

मसौदे में गंभीर मामलों के लिए कारावास और अधिक आर्थिक दंड का भी प्रावधान रखा गया है।

व्यक्तियों के लिए: गंभीर उल्लंघन के मामलों में एक वर्ष तक की कैद, दो लाख से पांच लाख रुपये तक जुर्माना अथवा दोनों सजाएं देने का प्रस्ताव है।

कंपनियों के लिए: गंभीर उल्लंघन पर एक वर्ष तक की कैद, 10 लाख से 25 लाख रुपये तक जुर्माना अथवा दोनों सजाओं का प्रावधान प्रस्तावित है। यदि जांच में कंपनी के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका सामने आती है, तो निर्धारित शर्तों के तहत उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।

इन प्रावधानों का उद्देश्य नियमों का पालन सुनिश्चित करना और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में प्रतिबंधित गतिविधियों को रोकना है।

बाढ़ की पहचान के लिए 5, 25 और 100 साल की अवधि क्यों?

मसौदे में बाढ़ क्षेत्र निर्धारित करने के लिए पांच वर्ष, 25 वर्ष और 100 वर्ष की पुनरावृत्ति अवधि वाली बाढ़ को आधार बनाने का प्रस्ताव है। इन अवधियों का इस्तेमाल किसी क्षेत्र में अलग-अलग तीव्रता की बाढ़ की संभावित सीमा और जोखिम का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है।

यहां 100 वर्ष की बाढ़ का अर्थ यह नहीं है कि ऐसी बाढ़ हर 100 साल में केवल एक बार ही आएगी। इसका मतलब है कि किसी भी वर्ष में उस स्तर की बाढ़ आने या उससे अधिक गंभीर बाढ़ आने की सांख्यिकीय संभावना लगभग एक प्रतिशत हो सकती है। इसी तरह, पांच वर्ष की पुनरावृत्ति अवधि वाली बाढ़ के लिए यह संभावना लगभग 20 प्रतिशत और 25 वर्ष की अवधि वाली बाढ़ के लिए लगभग चार प्रतिशत सालाना होती है।

ऐसे आकलन से यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किन इलाकों में निर्माण पर कड़े प्रतिबंध जरूरी हैं और किन क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ विकास कार्यों की अनुमति दी जा सकती है।

जमीन की कीमत घटने पर क्या मिलेगा मुआवजा?

प्रस्तावित कानून में जमीन के बाढ़ क्षेत्र में शामिल होने के कारण बाजार मूल्य या विकास की संभावना कम होने मात्र से स्वतः मुआवजा मिलने का अधिकार नहीं देने की बात कही गई है।

हालांकि, यदि किसी जमीन के वैध मौजूदा उपयोग पर स्थायी और गंभीर प्रभाव पड़ता है तथा मालिक को असाधारण और अनुपातहीन नुकसान साबित होता है, तो राज्य सरकार निर्धारित शर्तों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर सहायता देने पर विचार कर सकती है।

मसौदे में संभावित विकल्पों के रूप में आर्थिक मुआवजा, पुनर्वास सहायता, ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स (TDR) या संभव होने पर वैकल्पिक जमीन देने पर विचार करने का प्रावधान शामिल है। अवैध निर्माण, अतिक्रमण या नियमों का उल्लंघन कर की गई गतिविधियों के लिए मुआवजा नहीं देने का प्रस्ताव है।

इसलिए जमीन मालिकों के लिए जरूरी होगा कि वे संबंधित क्षेत्र की अधिसूचना, सीमांकन और जमीन के वैध उपयोग से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी रखें।

झारखंड में इस कानून का क्या असर पड़ सकता है?

यदि प्रस्तावित कानून लागू होता है, तो नदी किनारे जमीन खरीदने, निर्माण करने या औद्योगिक परियोजना शुरू करने वालों को बाढ़ क्षेत्र से जुड़े नियमों का विशेष ध्यान रखना पड़ सकता है। स्थानीय निकायों और संबंधित विभागों को भी निर्माण की अनुमति देते समय बाढ़ जोखिम और क्षेत्र के वर्गीकरण को ध्यान में रखना होगा।

इससे बाढ़ के पानी के प्राकृतिक रास्तों को सुरक्षित रखने, जल निकासी में बाधा कम करने और संवेदनशील इलाकों में अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण लगाने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, जिन जमीनों पर निर्माण या व्यावसायिक गतिविधियों की योजना है, उनके मालिकों और डेवलपरों को अंतिम नियमों तथा क्षेत्रवार सीमांकन की जानकारी लेना जरूरी होगा।

यह भी ध्यान रखना होगा कि कानून का वास्तविक प्रभाव इसके अंतिम स्वरूप, लागू होने की तारीख, अधिसूचित क्षेत्रों और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

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