सोशल संवाद / झारखंड : झारखंड हाईकोर्ट ने पारा शिक्षकों के पेंशन अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमित नियुक्ति से पहले पारा शिक्षक के रूप में संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर दी गई सेवा को भी पेंशन के लिए योग्य सेवा माना जाएगा।

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जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने पांच सेवानिवृत्त इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षकों की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को उनकी पारा शिक्षक अवधि को नियमित सेवा में जोड़कर पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने भुगतान में देरी होने पर सेवानिवृत्ति की तिथि से 6% वार्षिक साधारण ब्याज देने का भी आदेश दिया।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता माणिक चंद्र मंडल, उत्पल कुमार मुखर्जी, अब्दुल हमीद अंसारी, शिव नारायण गुप्ता और मोतीलाल टुडू पहले कई वर्षों तक पारा शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे। बाद में चयन प्रक्रिया के जरिए उनकी नियमित नियुक्ति इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक के रूप में हुई।
वर्ष 2025 में सेवानिवृत्त होने तक उन्होंने नियमित सेवा में लगभग 9 वर्ष या उससे कुछ अधिक समय तक कार्य किया। चूंकि उनकी नियमित सेवा 10 वर्ष से कम थी, इसलिए राज्य सरकार ने उन्हें पेंशन का लाभ देने से इनकार कर दिया। शिक्षकों का तर्क था कि उन्होंने पारा शिक्षक के रूप में 8 से 12 वर्ष तक लगातार सेवा दी है, जिसे पेंशन के लिए नियमित सेवा में जोड़ा जाना चाहिए।
राज्य सरकार ने क्या दलील दी?
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में कहा कि पारा शिक्षक की सेवा पूरी तरह संविदा आधारित थी, इसलिए उसे पेंशन योग्य सेवा नहीं माना जा सकता। सरकार का यह भी कहना था कि याचिकाकर्ताओं ने नियमित सरकारी सेवा में 10 वर्ष पूरे नहीं किए हैं, इसलिए वे पेंशन के पात्र नहीं हैं। सरकार ने अपने पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ पुराने फैसलों का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील क्यों खारिज की?
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि सरकार स्वयं नियमित शिक्षक भर्ती में 50 प्रतिशत पद पारा शिक्षकों के लिए आरक्षित करती रही है और इसके लिए न्यूनतम दो वर्ष की पारा शिक्षक सेवा अनिवार्य योग्यता थी।
अदालत ने कहा कि यदि नियुक्ति के समय पारा शिक्षक की सेवा को योग्यता माना गया, तो पेंशन के समय उसी सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकार एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) होने के नाते दोहरा रवैया नहीं अपना सकती। पेंशन कोई दया या अनुग्रह नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया गया आधार
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें प्रमुख हैं—
- Prem Singh vs State of Uttar Pradesh (2019)
- State of Himachal Pradesh vs Sheela Devi (2023)
- S.D. Jayaprakash vs Union of India (2025)
इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यदि किसी कर्मचारी की संविदा सेवा के बाद नियमित नियुक्ति होती है, तो पूर्व की सेवा को पेंशन के लिए जोड़ा जा सकता है। झारखंड हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के डिवीजन बेंच के निर्णय का भी उल्लेख करते हुए कहा कि संविदा या अस्थायी सेवा को पेंशन योग्य सेवा में शामिल करना न्यायसंगत और कानून के अनुरूप है।
सरकार को 8 सप्ताह में भुगतान का आदेश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि—
- पारा शिक्षक की पूरी सेवा अवधि को नियमित सेवा में जोड़ा जाए।
- पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की पुनर्गणना की जाए।
- आदेश प्राप्त होने के 8 सप्ताह के भीतर सभी बकाया राशि का भुगतान किया जाए।
- सेवानिवृत्ति की तिथि से वास्तविक भुगतान तक 6% वार्षिक साधारण ब्याज भी दिया जाए।
फैसले का क्या होगा असर?
यह फैसला झारखंड के उन हजारों पारा शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्होंने वर्षों तक संविदा पर सेवा देने के बाद नियमित नियुक्ति प्राप्त की है। यदि समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारी भी इस फैसले के दायरे में आते हैं, तो भविष्य में उन्हें भी पेंशन संबंधी राहत मिलने का रास्ता खुल सकता है।










