Jharkhand High Court: महिला के घर में घुसना और छेड़छाड़ दुष्कर्म का प्रयास नहीं, 4 साल की सजा बदली

By Tamishree Mukherjee

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सोशल संवाद / रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने करीब 26 साल पुराने एक मामले में अहम कानूनी फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी महिला के घर में देर रात घुसना और उसके साथ अमर्यादित हरकत करना अपने आप में दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत दी गई चार साल की कठोर कारावास की सजा को संशोधित कर दिया।

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न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद माना कि आरोपी का कृत्य महिला की लज्जा भंग करने के उद्देश्य से किया गया हमला था, जो IPC की धारा 354 के अंतर्गत आता है।

क्या था 1999 का मामला?

यह घटना 27 दिसंबर 1999 की देर रात पूर्वी सिंहभूम जिले के एक गांव की बताई गई है। शिकायत के अनुसार, महिला अपने घर में सो रही थी और उस समय घर में कोई पुरुष सदस्य मौजूद नहीं था। आरोप था कि रात करीब 12 बजे आरोपी गलत नीयत से दरवाजा खोलकर महिला के कमरे में दाखिल हुआ। इसके बाद उसने महिला के साथ कथित तौर पर बदसलूकी की और उसके कपड़े उठाकर छेड़छाड़ करने की कोशिश की।

महिला के शोर मचाने के बाद परिजन और आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। इसके बाद आरोपी वहां से फरार हो गया। घटना के संबंध में 31 दिसंबर 1999 को प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

निचली अदालत ने सुनाई थी 4 साल की सजा

मामले की जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। सुनवाई पूरी होने के बाद घाटशिला के अपर सत्र न्यायाधीश ने 28 जुलाई 2006 को आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत दोषी करार दिया था। निचली अदालत ने आरोपी को चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी की ओर से झारखंड हाई कोर्ट में आपराधिक अपील दायर की गई।

हाई कोर्ट ने क्यों बदली धारा?

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अमिकस क्यूरी की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों से दुष्कर्म के प्रयास के लिए जरूरी कानूनी तत्व पूरी तरह स्थापित नहीं होते हैं।

हाई कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि आरोपी के घर में प्रवेश करने और महिला के साथ अमर्यादित व्यवहार करने की बात सामने आती है, लेकिन ऐसा कोई प्रत्यक्ष और विशिष्ट कृत्य साबित नहीं हुआ, जिससे दुष्कर्म के प्रयास का अपराध स्थापित हो सके। अदालत ने माना कि आरोपी का आचरण महिला की लज्जा भंग करने और उस पर हमला करने की श्रेणी में आता है। इसलिए मामले को IPC की धारा 354 के तहत माना गया।

4 साल की सजा घटाकर जेल में बिताई अवधि तक सीमित

हाई कोर्ट ने सजा तय करते समय मामले की पुरानापन भी ध्यान में रखा। अदालत ने कहा कि घटना को 26 साल से अधिक समय बीत चुका है। साथ ही आरोपी का पहले कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा था। अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि आरोपी मामले की सुनवाई और अपील की प्रक्रिया के दौरान करीब 8 महीने जेल में रह चुका है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी की सजा को उसके द्वारा पहले से काटी गई जेल की अवधि तक सीमित कर दिया। इसके साथ ही उसे जमानत मुचलके से मुक्त करने का आदेश दिया गया।

क्या है इस फैसले का कानूनी महत्व?

झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए केवल गलत नीयत या महिला के साथ अमर्यादित व्यवहार पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों और दुष्कर्म की दिशा में किए गए विशिष्ट कृत्य को साक्ष्यों के आधार पर स्थापित करना होता है।

वहीं, अदालत ने आरोपी के व्यवहार को महिला की गरिमा और लज्जा भंग करने से जुड़े अपराध के रूप में माना और उसी के अनुरूप दोष व सजा में संशोधन किया।

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