सोशल संवाद/डेस्क : झारखंड हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को नई मजबूती प्रदान की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि बेटा-बहू द्वारा प्रताड़ना या मानसिक उत्पीड़न की स्थिति उत्पन्न होती है, तो माता-पिता को अपनी स्व-अर्जित संपत्ति से उन्हें बाहर निकालने का पूरा कानूनी अधिकार है। यह निर्णय न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक मिसाल बनकर सामने आया है।

ये भी पढे : यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम 2026 के लिए भी देवऋषि कश्यप का किया गया है चयन
इस फैसले में अदालत ने कहा कि “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007” का उद्देश्य बुजुर्गों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देना है। यदि घर का वातावरण अशांत हो और बुजुर्गों को मानसिक या शारीरिक कष्ट झेलना पड़े, तो उन्हें उसी घर में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला रामगढ़ जिले के एक बुजुर्ग दंपति से जुड़ा है, जिन्होंने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनका बेटा और बहू उन्हें लगातार परेशान कर रहे हैं। दंपति का कहना था कि उन्होंने अपनी मेहनत से यह मकान बनाया था, लेकिन अब उसी घर में उन्हें अपमान और प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संपत्ति स्व-अर्जित है और उस पर माता-पिता का पूर्ण अधिकार है। ऐसे में यदि वे अपने ही घर में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं, तो कानून उन्हें संरक्षण देता है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
हाई कोर्ट की पीठ ने कहा कि बुजुर्गों को शांतिपूर्ण जीवन जीने का मौलिक अधिकार है। यदि परिवार के सदस्य उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं, तो उन्हें कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पारिवारिक संबंधों का सम्मान जरूरी है, लेकिन यह सम्मान एकतरफा नहीं हो सकता।
यह फैसला उन मामलों में मार्गदर्शन देगा, जहां बुजुर्ग अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करते हैं। अदालत ने प्रशासन को भी निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए क्या है कानूनी प्रावधान?
“वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007” के तहत माता-पिता अपने बच्चों से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। साथ ही, यदि संपत्ति स्व-अर्जित है, तो वे उसे वापस लेने या बेदखली की कार्रवाई कर सकते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय समाज में जागरूकता बढ़ाने का काम करेगा और बुजुर्गों को अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाएगा।










