सोशल संवाद / डेस्क: झारखंड की पहचान सिर्फ जंगल, पहाड़, झरनों और धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है। राज्य के आदिवासी समाज के पास पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक चिकित्सा पद्धति भी मौजूद है। अब इसी आदिवासी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति यानी होड़ोपैथी को पर्यटन से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।
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World Tourism Day के मौके पर झारखंड के पर्यटन को पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों से जोड़ने की चर्चा तेज हुई है। राज्य के जंगलों में मौजूद कई औषधीय पौधों और वनस्पतियों का उपयोग पारंपरिक उपचार में किया जाता रहा है। ऐसे में धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों के साथ स्थानीय चिकित्सा पद्धति को जोड़ने की योजना ग्रामीण क्षेत्रों के लिए रोजगार का नया अवसर बन सकती है।
धार्मिक पर्यटन के साथ होड़ोपैथी को जोड़ने की संभावना
झारखंड के संताल परगना में मलूटी, देवघर और आसपास के धार्मिक स्थलों पर बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचते हैं। इन पर्यटन क्षेत्रों को आदिवासी पारंपरिक चिकित्सा और स्थानीय वेलनेस सेवाओं से जोड़ने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
इसी तरह गिरिडीह और छोटानागपुर के कई इलाकों में प्राकृतिक पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है। यहां मौजूद जंगलों में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां मिलती हैं, जिनका पारंपरिक रूप से औषधीय उपयोग किया जाता है।
क्या है होड़ोपैथी?
होड़ोपैथी को आदिवासी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के तौर पर जाना जाता है। संताली और मुंडारी भाषाई क्षेत्रों में इससे जुड़ा पारंपरिक ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। स्थानीय स्तर पर पेड़ों की छाल, जड़ और अन्य वनस्पतियों का इस्तेमाल विभिन्न पारंपरिक उपचारों में किया जाता है। इनमें हड्डियों, नसों और त्वचा से जुड़ी समस्याओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पारंपरिक नुस्खे भी शामिल हैं।
हालांकि, इन पारंपरिक उपचारों की वैज्ञानिक प्रभावशीलता और सुरक्षा का मूल्यांकन आधुनिक चिकित्सा मानकों के अनुसार अलग-अलग किया जाना जरूरी है।
आयुष से जोड़ने की कोशिश
पर्यटन के साथ स्वास्थ्य और वेलनेस सेवाओं को जोड़ने के लिए होड़ोपैथी को आयुष व्यवस्था से संबद्ध कराने की संभावनाओं पर भी काम किए जाने की बात सामने आई है।
संताली भाषा में ओलचिकी लिपि के माध्यम से होड़ोपैथी से जुड़े पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेज मौजूद होने की बात कही जाती है। ऐसे दस्तावेजों और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के साथ उन्हें व्यवस्थित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
योजना के तहत आदिवासी युवाओं को पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े ज्ञान की जानकारी देकर पर्यटन स्थलों के आसपास वेलनेस या पारंपरिक चिकित्सा केंद्र विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
झारखंड के पर्यटन को मिल सकती है नई पहचान
केरल में आयुर्वेद और वेलनेस टूरिज्म को पर्यटन उद्योग से जोड़ा गया है। इसी तरह झारखंड में आदिवासी संस्कृति, जंगल, औषधीय वनस्पति और पारंपरिक चिकित्सा को एक साथ प्रस्तुत करने से राज्य के पर्यटन को अलग पहचान मिल सकती है।
राज्य के कई इलाकों में झरने, जंगल और प्राकृतिक स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यदि इन क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी के साथ प्रमाणित और सुरक्षित वेलनेस सेवाएं विकसित की जाती हैं, तो इसका लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिल सकता है।
ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अवसर
होड़ोपैथी को पर्यटन से जोड़ने का एक प्रमुख उद्देश्य स्थानीय समुदाय को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना भी हो सकता है। पर्यटन स्थलों के आसपास स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, वेलनेस सेंटर, पारंपरिक उत्पाद, औषधीय पौधों से जुड़े उत्पाद और अन्य सेवाओं में रोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
आयुर्वेदाचार्य डॉ. वेंकटेश कात्यायन पांडेय के अनुसार, झारखंड के आदिवासी समाज के पास वनस्पतियों और पारंपरिक उपचार का लंबे समय से चला आ रहा ज्ञान है। उनका मानना है कि इसे पर्यटन से जोड़कर देशभर में प्रचारित किया जा सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
संरक्षण के साथ वैज्ञानिक अध्ययन भी जरूरी
पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को पर्यटन से जोड़ने के साथ उनके संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन पर भी ध्यान देना जरूरी होगा। स्थानीय ज्ञान को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करने, औषधीय पौधों की पहचान करने और उपचार से जुड़े दावों का वैज्ञानिक परीक्षण करने से इस क्षेत्र को अधिक व्यवस्थित रूप दिया जा सकता है।
World Tourism Day के अवसर पर झारखंड के लिए यह मॉडल आदिवासी संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यटन को एक मंच पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बन सकता है। यदि स्थानीय समुदाय की भागीदारी और वैज्ञानिक मानकों के साथ इसे आगे बढ़ाया जाता है, तो झारखंड में वेलनेस टूरिज्म का एक अलग मॉडल विकसित होने की संभावना है।











