जजों की नियुक्ति में पक्षपात का आरोप, जस्टिस के. चंद्रू ने मोदी सरकार से पूछा सवाल

By Tamishree Mukherjee

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सोशल संवाद / डेस्क : मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस के. चंद्रू ने भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और कॉलेजियम सिस्टम को लेकर कई अहम सवाल उठाए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को लेकर केंद्र सरकार के रुख, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी पर अपनी राय रखी। जस्टिस चंद्रू का कहना है कि देश में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक स्थायी और पारदर्शी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है।

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लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस चंद्रू एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म की ओर से आयोजित ‘जजों का फैसला कौन करेगा’ विषय पर चर्चा में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे बदलने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत बताई।

NJAC रद्द होने के बाद केंद्र सरकार ने संशोधन क्यों नहीं किया?

जस्टिस के. चंद्रू ने कहा कि साल 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के जरिए जजों की नियुक्ति की व्यवस्था बनाने की कोशिश की थी। हालांकि, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने NJAC कानून और उससे जुड़े संवैधानिक संशोधन को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया था।

जस्टिस चंद्रू के अनुसार, अदालत के फैसले के बाद सरकार के पास संबंधित प्रावधानों में संशोधन कर एक नई व्यवस्था लाने का विकल्प था। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार ने संसद में इस विषय पर दोबारा पहल करके न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कोई स्थायी आयोग बनाने की कोशिश क्यों नहीं की।

उनका तर्क था कि किसी न्यायिक फैसले को सीधे पलटने के बजाय उसके आधार पर विचार करके कानून में बदलाव किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसके बजाय मौजूदा व्यवस्था के तहत ही नियुक्तियां होती रहीं।

कॉलेजियम सिस्टम पर जस्टिस चंद्रू ने क्या कहा?

जस्टिस चंद्रू ने कॉलेजियम सिस्टम की आलोचना करते हुए कहा कि जजों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल बने हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्दे के पीछे होने वाली सहमति और लेन-देन की प्रक्रिया मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा बन गई है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि केंद्र सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों की प्रक्रिया में भूमिका निभा रही है, तो NJAC जैसी व्यवस्था को लेकर उसकी चिंता क्यों होनी चाहिए।

जस्टिस चंद्रू ने NJAC और कॉलेजियम की तुलना करते हुए कहा कि आयोग जैसी व्यवस्था में निष्पक्ष मूल्यांकन और पारदर्शिता की गुंजाइश हो सकती है। उनके मुताबिक, नियुक्ति प्रक्रिया के मानदंड स्पष्ट होने चाहिए, ताकि फैसलों पर सवाल उठने की स्थिति कम हो।

जस्टिस विक्टोरिया गौरी और एडवोकेट जॉन सत्यन का उदाहरण

अपने संबोधन में जस्टिस चंद्रू ने न्यायिक नियुक्तियों में कथित असमानता का मुद्दा उठाने के लिए जस्टिस विक्टोरिया गौरी और एडवोकेट जॉन सत्यन का उदाहरण दिया।

उन्होंने जस्टिस विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति और जॉन सत्यन की नियुक्ति संबंधी सिफारिश पर उठे सवालों का जिक्र करते हुए कहा कि अलग-अलग मामलों में नियुक्ति प्रक्रिया के नतीजों को लेकर सवाल पैदा होते हैं। उन्होंने इस संदर्भ में न्यायपालिका में वैचारिक झुकाव और कुछ नामों को प्राथमिकता मिलने के आरोप भी लगाए।

जस्टिस चंद्रू ने हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर कथित पक्षपात पर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ खास वैचारिक समूहों से जुड़े लोगों की नियुक्ति संबंधी सिफारिशों को मंजूरी मिलने में आसानी होती है, जबकि अन्य मामलों में देरी हो सकती है।

हालांकि, ये जस्टिस चंद्रू के विचार और आरोप हैं। नियुक्ति से जुड़े प्रत्येक मामले की स्थिति और संबंधित पक्षों का पक्ष अलग-अलग तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए।

जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता की जरूरत

जस्टिस चंद्रू ने कहा कि भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें स्पष्ट मानदंडों और निष्पक्ष मूल्यांकन को महत्व मिले।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि न्यायपालिका में नियुक्तियों के लिए कानून के जानकारों और विधि के शिक्षाविदों जैसे अन्य संभावित उम्मीदवारों पर पर्याप्त विचार क्यों नहीं किया जाता। उनके अनुसार, नियुक्ति के अलग-अलग रास्तों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ताकि योग्य लोगों को अवसर मिल सके।

उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कानून के शिक्षाविदों को भी न्यायिक पदों पर नियुक्त किया जाता है। भारत में भी न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को व्यापक और पारदर्शी बनाने पर विचार होना चाहिए।

क्या है NJAC और कॉलेजियम सिस्टम?

कॉलेजियम सिस्टम: भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करने वाली व्यवस्था को कॉलेजियम सिस्टम कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया में केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की भी भूमिका होती है।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC): NJAC की स्थापना न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में न्यायपालिका के साथ सरकार और अन्य सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी। इसके लिए 99वां संविधान संशोधन और NJAC अधिनियम, 2014 लाया गया था। हालांकि, अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया और कॉलेजियम व्यवस्था को बरकरार रखा।

न्यायिक नियुक्तियों पर फिर तेज हुई बहस

जस्टिस के. चंद्रू के बयान ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया, कॉलेजियम सिस्टम की पारदर्शिता और NJAC जैसे वैकल्पिक मॉडल पर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। उनके मुताबिक, इस मुद्दे का समाधान किसी अस्थायी व्यवस्था के बजाय स्थायी और स्पष्ट नियमों के जरिए होना चाहिए।

न्यायिक नियुक्तियों से जुड़ी यह बहस केवल जजों के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संस्थागत जवाबदेही और जनता के विश्वास से भी जुड़ी है। ऐसे में नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के सवाल आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण बने रह सकते हैं।

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