सोशल संवाद/डेस्क: बिहार में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने वाले नियोजित शिक्षकों पर शिकंजा कसता जा रहा है। निगरानी विभाग की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जिसमें राज्य के विभिन्न जिलों में 2916 शिक्षक फर्जी प्रमाणपत्र और जाली अंकपत्र के सहारे नौकरी करते पाए गए हैं। इन सभी मामलों में संबंधित जिलों में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।
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दिसंबर 2025 तक शिक्षा बोर्डों से कराए गए प्रमाणपत्र सत्यापन के दौरान यह गड़बड़ी सामने आई। जांच में पाया गया कि कई शिक्षकों ने अपने अंकपत्र में छेड़छाड़ कर नंबर बढ़ाए, जबकि कुछ ने दूसरे अभ्यर्थियों के नाम और रोल नंबर का इस्तेमाल कर नियुक्ति हासिल की। कई मामलों में प्रमाणपत्रों पर पिता का नाम मेल नहीं खाता, वहीं कुछ दस्तावेज पूरी तरह जाली पाए गए हैं।
निगरानी विभाग के अनुसार यह आंकड़ा अभी अंतिम नहीं है। पटना हाईकोर्ट के आदेश पर वर्ष 2006 से 2015 के बीच बहाल शिक्षकों की जांच की जा रही है और आगे चलकर फर्जी शिक्षकों की संख्या और बढ़ सकती है। विभाग यह भी पता लगाने में जुटा है कि इस पूरे फर्जीवाड़े के पीछे कौन से संगठित गिरोह काम कर रहे थे।
जांच के दौरान कुछ बेहद गंभीर मामले भी सामने आए हैं। पटना के कोतवाली थाना क्षेत्र में दर्ज एक केस में पता चला कि एक शिक्षिका ने पात्रता परीक्षा दी ही नहीं थी, फिर भी रिकॉर्ड में हेराफेरी कर उसे पास दिखाया गया। इसके अलावा कई लोग फर्जी विश्वविद्यालयों और अमान्य बोर्डों के प्रमाणपत्रों के सहारे वर्षों तक शिक्षक बने रहे और वेतन लेते रहे।
वहीं, सक्षमता परीक्षा को लेकर भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। बड़ी संख्या में शिक्षक या तो परीक्षा में शामिल नहीं हो पाए हैं या सफल नहीं हो सके हैं, जिससे हजारों शिक्षकों की नौकरी पर खतरा मंडराने लगा है। शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर यह मामला अब एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।










