शादी कोई ऐसा रिश्ता नहीं, जिसे बीमारी के नाम पर तोड़ दिया जाए : हाई कोर्ट

By Riya Kumari

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शादी कोई ऐसा रिश्ता नहीं, जिसे बीमारी के नाम पर तोड़ दिया जाए : हाई कोर्ट

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सोशल संवाद/डेस्क : कोर्ट ने माना कि पति पत्नी के खिलाफ न तो क्रूरता के आरोप साबित कर सका और न ही ऐसी मानसिक बीमारी का प्रमाण दे पाया, जो हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का आधार बन सके। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पति की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। पत्नी ने मानसिक बीमारी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि दहेज में पांच लाख रुपये की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया गया।

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कोर्ट ने ये कहा …

बच्चे की कस्टडी तय करते समय माता-पिता की इच्छा या आर्थिक स्थिति से ज्यादा उसकी भलाई और भविष्य को महत्व दिया जाना चाहिए। केवल पिता के आर्थिक रूप से सक्षम होने या प्राकृतिक अभिभावक होने के आधार पर बच्चे की कस्टडी उन्हें नहीं दी जा सकती। बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए माता-पिता दोनों का प्यार, देखभाल और संरक्षण जरूरी है। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी झारखंड हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक मामले में की है। अदालत ने करीब साढ़े पांच साल के बच्चे की कस्टडी मां के पास ही रखने के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की खंडपीठ ने पिता की अपील को निष्पादित करते हुए यह फैसला सुनाया।

पति की अपील खारिज

झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी पर क्रूरता और मानसिक बीमारी का आरोप लगाकर तलाक की मांग करने वाले पति की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में विवाह को बेहद सम्मानपूर्ण और पवित्र रिश्ता माना जाता है। वैवाहिक जीवन में आने वाली बीमारी, परेशानी और कठिनाइयों का सामना पति-पत्नी को मिलकर करना चाहिए। केवल सामान्य आरोपों या मानसिक बीमारी की आशंका के आधार पर विवाह समाप्त नहीं किया जा सकता।

पत्नी के व्यवहार पर शादी के बाद उठाए थे सवाल

पति का आरोप था कि शादी के शुरुआती दिनों से ही पत्नी का व्यवहार असामान्य और आक्रामक था। शादी से पहले पत्नी की मानसिक स्थिति की जानकारी उससे छिपाई गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मानसिक बीमारी को तलाक का आधार बनाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि बीमारी ऐसी गंभीर है कि पति या पत्नी से दूसरे पक्ष के साथ रहना उचित रूप से अपेक्षित नहीं किया जा सकता। इसके लिए विशेषज्ञ की चिकित्सकीय राय और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।

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