सोशल संवाद / डेस्क : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत में जाति आधारित आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए, जब तक समाज में सामाजिक असमानता और भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते। उन्होंने इस विषय को डॉ. भीमराव अंबेडकर के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

IIMUN के कार्यक्रम में युवाओं से संवाद
मोहन भागवत ने यह बात भारत इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कही। इस दौरान उन्होंने 2,000 से अधिक युवा प्रतिभागियों को संबोधित किया। कार्यक्रम में छात्रों ने आरक्षण नीति, शिक्षा, रोजगार और जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलनों जैसे विषयों पर सवाल पूछे।
आरक्षण पर सीधा ‘हां’ या ‘ना’ नहीं कहा
जब उनसे पूछा गया कि क्या शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दायरा कम करने का समय आ गया है, तो मोहन भागवत ने सीधे ‘हां’ या ‘ना’ में जवाब देने से इनकार कर दिया।
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को डॉ. बी.आर. अंबेडकर की मूल भावना के साथ समझना चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है और जब तक समाज में भेदभाव और असमानता बनी रहेगी, तब तक इसकी आवश्यकता भी बनी रहेगी।
सक्षम लोगों से आरक्षण छोड़ने की अपील
भागवत ने आरक्षित वर्ग के आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम लोगों से भी अपील की कि वे स्वेच्छा से आरक्षण का लाभ छोड़ने पर विचार करें, ताकि इसका लाभ उन लोगों तक पहुंच सके जो वास्तव में जरूरतमंद और वंचित हैं।
उन्होंने कहा कि समाज के कमजोर वर्गों तक आरक्षण का लाभ समान रूप से पहुंचे, इसके लिए इस दिशा में सकारात्मक सोच विकसित होनी चाहिए। उन्होंने आरक्षण में उप-वर्गीकरण (Sub-Categorisation) को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों का भी उल्लेख किया।
आरक्षण को राजनीतिक मुद्दा बनाने पर जताई चिंता
मोहन भागवत ने कहा कि आरक्षण को राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के उद्देश्य से बनाई गई थी। इसलिए इस विषय पर राजनीति के बजाय सामाजिक दृष्टिकोण अपनाना अधिक आवश्यक है।
सामाजिक न्याय पर दिया जोर
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि समाज में समान अवसर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से भी आग्रह किया कि वे आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों को टकराव की बजाय संविधान और डॉ. अंबेडकर की भावना के अनुरूप समझने का प्रयास करें।









