बारिश का 25% पानी जमीन तक पहुंचने से पहले ही उड़ जाता है, IITM की रिसर्च में बड़ा खुलासा

By Tamishree Mukherjee

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Monsoon Rain Evaporation

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सोशल संवाद / डेस्क : जब भी बारिश होती है, आमतौर पर यह माना जाता है कि बादलों से गिरने वाला सारा पानी जमीन तक पहुंच जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च ने इस धारणा को बदल दिया है। अध्ययन के मुताबिक, मॉनसून के दौरान बादलों से बरसने वाले पानी का औसतन 25 प्रतिशत हिस्सा जमीन तक पहुंचने से पहले ही हवा में वाष्प (भाप) बनकर उड़ जाता है।

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यह अध्ययन भारत में पहली बार किया गया है और इससे मौसम पूर्वानुमान तथा जलवायु मॉडल को पहले से अधिक सटीक बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

IITM पुणे की रिसर्च में क्या सामने आया?

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मैट्रोलॉजी (IITM), पुणे के वैज्ञानिकों ने उत्तर-पश्चिमी पश्चिमी घाट क्षेत्र में मॉनसून के दौरान होने वाली वर्षा का विस्तृत अध्ययन किया। रिसर्च में पाया गया कि बारिश की लगभग एक चौथाई बूंदें जमीन तक पहुंचने से पहले ही वाष्पित हो जाती हैं। यह खोज भारतीय मॉनसून को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

बारिश की बूंदों का वाष्प बनना क्यों है महत्वपूर्ण?

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह केवल पानी की मात्रा कम होने का मामला नहीं है। जब बारिश की बूंदें हवा में ही वाष्पित होती हैं, तो वे आसपास की हवा से ऊष्मा अवशोषित करती हैं, जिससे हवा ठंडी हो जाती है। यह ठंडी हवा नीचे की ओर बहती है और बादलों के बनने, वर्षा की तीव्रता तथा मौसम की अन्य प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है। इसी कारण इस प्रक्रिया को समझना मॉनसून पूर्वानुमान और क्लाइमेट मॉडलिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पूरे देश में होगा अध्ययन

वैज्ञानिकों का मानना है कि देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बारिश के वाष्पीकरण की मात्रा अलग हो सकती है।

उदाहरण के लिए—

  • राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में
  • हिमालयी इलाकों में
  • तटीय राज्यों में

बारिश की बूंदों के वाष्पित होने का प्रतिशत अलग-अलग हो सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए IITM अब अपने आइसोटोप नेटवर्क की मदद से देशभर में इस प्रक्रिया का अध्ययन करेगा।

मौसम पूर्वानुमान में कैसे मिलेगी मदद?

इस शोध के बाद वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि—

  • मॉनसून का पूर्वानुमान अधिक सटीक होगा।
  • वर्षा की वास्तविक मात्रा का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अधिक सटीक विश्लेषण संभव होगा।
  • जल संसाधन प्रबंधन और कृषि योजना बनाने में मदद मिलेगी।
  • बाढ़ और सूखे जैसी परिस्थितियों के बेहतर पूर्वानुमान में सहायता मिलेगी।
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