सोशल संवाद / जमशेदपुर : जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था में ‘रेफरल कल्चर’ गंभीर संकट बनता जा रहा है। हालात यह है कि कई केंद्रों में जितने मरीजों का इलाज हुआ, उससे अधिक को रेफर कर दिया गया। पूर्वी सिंहभूम के स्वास्थ्य केंद्रों में औसत रेफरल दर 55-60 प्रतिशत तथा पश्चिमी सिंहभूम व सरायकेला खरसावां जिले में 65-70 प्रतिशत तक पहुंच गई है। नतीजा यह है कि एमजीएम और सदर अस्पतालों में भीड़ क्षमता से अधिक हो रही है, जिससे सामान्य मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।
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बुखार, वायरल, डायरिया, बीपी-शुगर और सामान्य डिलीवरी जैसे मामलों में भी मरीजों को रेफर किया जा रहा है, जबकि इलाज प्राथमिक स्तर पर संभव है। इससे ग्रामीण मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। पटमदा-बहरागोड़ा जैसे इलाके से आने-जाने में 200 से 300 रुपए, दवा-जांच में 300से 800 रुपए और एक दिन की मजदूरी का नुकसान, यानी मामूली बीमारी में भी 800 से 1500 रुपए तक खर्च हो रहा है।
इसलिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बढ़ रहा रेफरल कल्चर
1. लैब और बेसिक जांच की कमी :
बोड़ाम और पोटका के कई पीएचसी/एचएससी में ब्लड, शुगर और यूरिन जांच की सुविधा नियमित नहीं है। जांच नहीं होने पर डॉक्टर सीधे मरीज को एमजीएम या सदर भेज रहे हैं।
2. डॉक्टर नहीं, नर्स के भरोसे इलाजः
मुसाबनी, गुड़ाबांदा और डुमरिया प्रखंड के कई स्वास्थ्य केंद्रों में नियमित डॉक्टर नहीं हैं। एएनएम और जीएनएम ओपीडी संभाल रही हैं, जिससे जटिल केस तुरंत रेफर हो रहे हैं।
3 दवाओं का सीमित स्टॉक :
चाकुलिया और बहरागोड़ा क्षेत्र के कुछ केंद्रों में जरूरी दवाओं की कमी बनी रहती है। ऐसे में प्राथमिक इलाज भी संभव नहीं हो पाता और मरीज को बाहर भेजना पड़ता है।
4 24×7 डिलीवरी सुविधा का अभाव
डुमरिया, बोड़ाम और पोटका के कई केंद्रों में रात के समय प्रसव सुविधा या प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। इस कारण सामान्य डिलीवरी केस भी एमजीएम सदर रेफर।
जवाबदेही से बचने की प्रवृत्तिः
5 ग्रामीण केंद्रों में जटिलता बढ़ने पर कई बार डॉक्टर जोखिम नहीं लेते और सेफ जोन के तौर पर बड़े अस्पताल रेफर कर देते हैं।









