सोशल संवाद / रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म के प्रयास और उसकी गला घोंटकर हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे धानों टुडू की सजा स्थगित कर जमानत पर रिहा करने की याचिका खारिज कर दी है।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जघन्य अपराधों में केवल 10 साल या उससे अधिक अवधि जेल में बिताना सजा स्थगित करने या जमानत देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने यह आदेश दिया। यह मामला पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी थाना से जुड़ा है। मामला 19 नवंबर 2015 का है।
अभियोजन के अनुसार, मुसाबनी थाना क्षेत्र के तिलाबनी गांव में करमा पूजा के दौरान छोटका गोप और धानों टुडू नाबालिग बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गए थे। अगले दिन सुबह गांव की झाड़ियों में बच्ची का शव मिला था। उसके गले में पतली रस्सी लिपटी हुई थी। जमशेदपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 25 फरवरी 2020 को दोनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अलावा धारा 376डी/511 के तहत दुष्कर्म के प्रयास के मामले में 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा भी दी गई थी।
10 साल से अधिक जेल में रहने का दिया गया हवाला
धानों टुडू की ओर से अधिवक्ता मनोज दास ने दलील दी कि वह करीब साढ़े 10 साल जेल में रह चुका है। ऐसे में आजीवन कारावास की सजा का एक बड़ा हिस्सा वह भुगत चुका है और न्यायहित में उसकी सजा स्थगित कर जमानत दी जानी चाहिए। राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक विश्वनाथ राय ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट पहले ही दो नवंबर 2023 को गुण-दोष के आधार पर आवेदक की सजा स्थगित करने की याचिका खारिज कर चुका है।












