सोशल संवाद /डेस्क : झारखंड की पारंपरिक कला और प्राकृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में दलमा क्षेत्र तेजी से नई पहचान बना रहा है। अब दलमा वन्यजीव अभयारण्य और आसपास के ग्रामीण इलाकों में सोहराय एवं टेराकोटा कला को पर्यटन से जोड़ने की पहल की जा रही है। इससे न केवल स्थानीय संस्कृति को नई पहचान मिलेगी, बल्कि ग्रामीण युवाओं और कलाकारों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

यह भी पढे : भाजपा सरायकेला-खरसावां जिला कमेटी ने Arjun Munda को दिया प्रशिक्षण शिविर का निमंत्रण
दलमा क्षेत्र पहले से ही अपने जंगल, पहाड़ और हाथियों के लिए प्रसिद्ध है। हाल के वर्षों में यहां जंगल सफारी, ईको-कॉटेज और इको-टूरिज्म परियोजनाओं पर तेजी से काम हो रहा है।
सोहराय कला बनेगी पर्यटन की नई पहचान
सोहराय कला झारखंड की पारंपरिक आदिवासी भित्ति चित्रकला है, जिसे मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाएं प्राकृतिक रंगों से तैयार करती हैं। इस कला में प्रकृति, पशु-पक्षी, खेती और ग्रामीण जीवन की झलक देखने को मिलती है। सोहराय और खोवर कला को जीआई टैग भी मिल चुका है, जिससे इसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस कला को पर्यटन से जोड़ा जाए, तो गांवों में आने वाले पर्यटक स्थानीय संस्कृति को करीब से देख सकेंगे और कलाकारों की आय भी बढ़ेगी।
टेराकोटा उत्पादों की बढ़ रही मांग
दलमा और आसपास के क्षेत्रों में मिट्टी से बने टेराकोटा उत्पाद भी पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। पहले भी दलमा क्षेत्र में प्लास्टिक के विकल्प के रूप में मिट्टी की बोतलें और अन्य स्थानीय उत्पाद पर्यटकों के लिए उपलब्ध कराए गए थे।
अब ग्रामीण महिलाओं और कारीगरों द्वारा तैयार की गई पारंपरिक कलाकृतियां, सजावटी सामान और हस्तशिल्प उत्पाद पर्यटन बाजार में नई पहचान बना सकते हैं।
इको-टूरिज्म से गांवों को मिलेगा फायदा
राज्य सरकार दलमा वन्यजीव अभयारण्य को इको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। यहां जंगल सफारी, ग्लास ब्रिज, ईको-कॉटेज और पर्यटन सुविधाओं के विस्तार की योजनाएं चल रही हैं। (Jagran)
विशेषज्ञों का कहना है कि जब पर्यटक गांवों तक पहुंचेंगे, तो स्थानीय लोगों को गाइड, हस्तशिल्प बिक्री, भोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सीधा लाभ मिलेगा।
महिलाओं को मिलेगा आर्थिक सशक्तिकरण
सोहराय कला मुख्य रूप से ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं द्वारा तैयार की जाती है। कई संस्थाएं और समूह इस कला को आधुनिक बाजार से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे महिलाओं की आय और आत्मनिर्भरता में बढ़ोतरी हो रही है।
झारखंड की संस्कृति को मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों के अनुसार, दलमा क्षेत्र में पर्यटन और पारंपरिक कला का यह मेल झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगा। इससे राज्य के ग्रामीण इलाकों में रोजगार बढ़ेगा और देश-दुनिया के पर्यटकों को झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति को करीब से जानने का मौका मिलेगा।










