सोशल संवाद / डेस्क : अंतरिक्ष में एक बड़ी खगोलीय घटना ने वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सूर्य से निकला एक शक्तिशाली सौर तूफान पृथ्वी की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जिसके चलते अंतरिक्ष एजेंसियां और मौसम वैज्ञानिक सतर्क हो गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह सौर विस्फोट इस वर्ष के सबसे प्रभावशाली सौर घटनाक्रमों में से एक माना जा रहा है।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूर्य के “एक्टिव रीजन 4461” में 6 जून को एक शक्तिशाली विस्फोट हुआ, जिसे एम1.8 श्रेणी का सोलर फ्लेयर बताया गया है। इस विस्फोट के साथ सूर्य से चुंबकीय ऊर्जा और गैस का विशाल बादल अंतरिक्ष में फैल गया। यह बादल लगभग 1,400 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से पृथ्वी की दिशा में बढ़ रहा है।
भू-चुंबकीय तूफान की चेतावनी
अंतरिक्ष मौसम विशेषज्ञों ने पृथ्वी के लिए जी3 श्रेणी के मजबूत भू-चुंबकीय तूफान की चेतावनी जारी की है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि परिस्थितियां अनुकूल होने पर इसकी तीव्रता जी4 स्तर तक भी पहुंच सकती है। इस तरह के तूफान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं और उपग्रह संचार, रेडियो नेटवर्क तथा बिजली प्रणालियों पर असर डाल सकते हैं।
आसमान में दिख सकता है अद्भुत नजारा
इस सौर तूफान का सबसे आकर्षक प्रभाव अरोरा (Aurora) के रूप में देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अक्षांश वाले क्षेत्रों में रंग-बिरंगी आकाशीय रोशनी दिखाई दे सकती है। यदि तूफान अपेक्षा से अधिक शक्तिशाली साबित हुआ, तो उत्तरी भारत के कुछ पहाड़ी इलाकों में भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
पृथ्वी की सुरक्षा ढाल पर निर्भर करेगा असर
विशेषज्ञों के अनुसार सौर तूफान का वास्तविक प्रभाव उसके चुंबकीय रुख (Bz Component) पर निर्भर करेगा। यदि इसका रुख दक्षिण दिशा में रहा, तो पृथ्वी की चुंबकीय सुरक्षा ढाल यानी मैग्नेटोस्फीयर कुछ समय के लिए कमजोर पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में सूर्य से आने वाले आवेशित कण वायुमंडल में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे अरोरा जैसी घटनाएं और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देंगी।
‘कैनिबल सीएमई’ बनने की आशंका
वैज्ञानिकों ने एक और संभावना जताई है जिसे “कैनिबल सीएमई” कहा जाता है। दरअसल, सूर्य से इससे पहले भी कुछ कमजोर सौर तूफान निकले थे। यदि नया और अधिक तेज तूफान रास्ते में इन पुराने तूफानों को पकड़कर अपने साथ मिला लेता है, तो इसकी शक्ति और बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी पर इसका प्रभाव अपेक्षा से अधिक हो सकता है।
हालांकि वैज्ञानिक लगातार इस गतिविधि पर नजर बनाए हुए हैं। सौर बादल के पृथ्वी के करीब पहुंचने के बाद ही उसके वास्तविक प्रभाव और तीव्रता का अधिक सटीक आकलन किया जा सकेगा।









