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सोन नदी जल बंटवारे पर झारखंड कैबिनेट की मुहर, बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को मिलेगा 2 MAF पानी

By Tamishree Mukherjee

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सोशल संवाद / झारखण्ड : झारखंड और बिहार के बीच लंबे समय से लंबित सोन नदी के जल बंटवारे के मुद्दे पर बड़ा फैसला सामने आया है। झारखंड कैबिनेट ने 1973 के बाणसागर परियोजना समझौते के तहत सोन नदी बेसिन के जल बंटवारे से संबंधित एकरारनामा (Agreement Draft) को मंजूरी दे दी है। इस निर्णय के बाद दोनों राज्यों के बीच वर्षों से चल रहा विवाद सुलझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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क्या है बाणसागर परियोजना समझौता?

वर्ष 1973 में हुए बाणसागर परियोजना समझौते के अनुसार, पूर्ववर्ती बिहार राज्य को 7.75 मिलियन एकड़ फुट (MAF) जल आवंटित किया गया था। झारखंड राज्य के गठन के बाद इस जल हिस्सेदारी का दोनों राज्यों के बीच पुनर्बंटवारा किया जाना था। अब इसी संबंध में तैयार किए गए समझौते के प्रारूप को झारखंड सरकार ने अपनी मंजूरी दे दी है।

पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में हुई थी चर्चा

सोन नदी के जल बंटवारे का मुद्दा पूर्वी क्षेत्रीय परिषद (Eastern Zonal Council) की बैठक में भी उठा था। दोनों राज्यों ने अपने-अपने पक्ष मजबूती से रखे थे। झारखंड सरकार का कहना था कि उसने पहले ही बिहार को 6.85 MAF पानी उपलब्ध कराया है, जबकि बिहार सरकार अतिरिक्त 0.50 MAF पानी की मांग कर रही थी।

झारखंड का यह भी तर्क था कि बिहार को कुल 7.75 MAF पानी की आवश्यकता बताई जा रही है, जबकि फरक्का बैराज पर उसका वास्तविक उपयोग लगभग 3.03 MAF है। इसके अलावा उत्तर कोयल नदी का पूरा जलग्रहण क्षेत्र वर्तमान में बिहार के गया और औरंगाबाद जिलों में स्थित है, जिसे भी जल बंटवारे में ध्यान में रखा जाना चाहिए।

2 MAF पानी पर बनी अंतिम सहमति

शुरुआत में झारखंड ने अपने हिस्से के लिए 2.35 MAF पानी की मांग की थी। हालांकि दोनों राज्यों के बीच विस्तृत चर्चा और सहमति के बाद झारखंड ने 2.00 MAF पानी पर सहमति जताई। इसके अनुसार 1973 के बाणसागर समझौते के तहत कुल 7.75 MAF जल का अंतिम बंटवारा इस प्रकार होगा—

  • बिहार: 5.75 MAF
  • झारखंड: 2.00 MAF

क्या होगा इस फैसले का असर?

कैबिनेट की मंजूरी के बाद दोनों राज्यों के बीच जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन का रास्ता साफ होगा। इससे सिंचाई, पेयजल और जल संसाधन परियोजनाओं के संचालन में स्पष्टता आएगी तथा भविष्य में जल विवादों की संभावना भी कम होगी। यह निर्णय अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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