शल संवाद/डेस्क : भाजपा सरकार लगातार नागरिकों की जासूसी करती रही है, लेकिन इस बार जब वह रंगे हाथों पकड़ी गई, तो पूरे देश को एक झूठे और भ्रामक “स्पष्टीकरण” के ज़रिये गुमराह करने की कोशिश की। उनके संचार मंत्री ने दावा किया कि संचार साथी ऐप को हटाया जा सकता है, जबकि सरकार के अपने ही निर्देशों की धारा 7(b) साफ कहती है कि यह प्री-इंस्टॉल्ड ऐप हटाया नहीं जा सकता और इसकी किसी भी कार्यात्मकता को अक्षम या सीमित नहीं किया जा सकता (अनुबंध 1 देखें)। यह स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि साफ-साफ झूठ है एक असंवैधानिक आदेश को छुपाने के लिए 140 करोड़ नागरिकों को गलत जानकारी परोसने का प्रयास। जब सरकार अपनी ही जासूसी व्यवस्था पर झूठ बोलने लगे, तो यह न सिर्फ उसकी नाकामी बल्कि उसके खतरनाक निरंकुश इरादों को भी उजागर करता है।
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भाजपा की शब्दावली में अब IT का मतलब “सूचना प्रौद्योगिकी” नहीं, बल्कि “पहचान की चोरी” है। स्मार्टफोन निर्माताओं और आयातकों को हर नए फ़ोन में संचार साथी ऐप अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने का ताज़ा फरमान नागरिकों के निजता के मौलिक अधिकार पर सीधा हमला है और जन-निगरानी को सामान्य बनाने की एक सिहरन पैदा करने वाली कवायद है। यह ऑरवेलियन दखल निजी बातचीत, व्यक्तिगत फ़ाइलों और गोपनीय डेटा तक पहुंच बना कर नागरिकों के जीवन के सबसे निजी हिस्सों में सेंध लगाता है। भाजपा अब आपके शयनकक्ष तक पहुंच चुकी है। डिजिटल जासूसी और अनियंत्रित निगरानी के ज़रिये सरकार व्यक्तियों में डर, दमन और नियंत्रण स्थापित करना चाहती है, जिससे नागरिक स्वतंत्रता क्षीण हो और असहमति को योजनाबद्ध तरीके से दबाया जा सके। नागरिकों को राज्य के स्थायी निगरानी-शिकार में बदलने की इस असंवैधानिक कोशिश को देश स्वीकार नहीं करेगा।
नागरिकों के फ़ोन में जबरन एक स्थायी, न हटाए जा सकने वाला निगरानी उपकरण ठूँसकर, भाजपा सरकार ने सहमति और व्यक्तिगत स्वायत्तता के हर मायने को मिटा दिया है। यह ऐप लोकेशन ट्रैकिंग, डिवाइस डेटा संग्रह, ब्राउज़िंग निगरानी और संचार मेटाडेटा तक पहुंच जैसे कई खतरनाक कार्यों के लिए हथियार की तरह प्रयोग किया जा सकता हैवह भी बिना किसी जानकारी या अनुमति के (अनुबंध 2 देखें)। मोबाइल फ़ोन हमारे जीवन के सबसे निजी पहलुओं को संजोए रखते हैं। इस क्षेत्र में सरकारी घुसपैठ निजता का खुला उल्लंघन है और नागरिकों के ही उपकरणों को सरकार के नियंत्रण का औज़ार बना देता है। इस आदेश को बिना किसी सार्वजनिक परामर्श या पारदर्शिता के लागू करना लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति सरकार की अवमानना का स्पष्ट प्रमाण है।
इसके अलावा, सरकार का निगरानी-जुनून अब एक और निरंकुश स्तर पर पहुंच चुका है। सरकार का नया सिम-बाइंडिंग आदेश जिसमें व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, सिग्नल और सभी प्रमुख संचार प्लेटफार्मों को हर अकाउंट को हमेशा सक्रिय सिम के साथ जोड़े रखने और वेब सेशन हर छह घंटे में लॉगआउट करने के लिए मजबूर किया जा रहा है रीयल-टाइम ट्रैसेबिलिटी और पूर्ण डिजिटल नियंत्रण की ओर बड़ा कदम है। अब हर संदेश, हर बातचीत और हर लॉगिन सरकारी निगरानी की परिधि में ला दिया गया है। अपनी ही खस्ताहाल टेलीकॉम-KYC प्रणाली को ठीक करने के बजाय भाजपा सरकार 80 करोड़ डिजिटल उपयोगकर्ताओं को सज़ा दे रही है, ताकि निगरानी का जाल और फैलाया जा सके। यह साइबर सुरक्षा नहीं यह कानून-व्यवस्था के नाम पर राज्य की अति-हस्तक्षेपकारी जासूसी है (अनुबंध 3 देखें)।
यह एक अलग-थलग गलती नहीं है, बल्कि भाजपा सरकार की लंबे समय से जारी दमनकारी और दखलकारी निगरानी नीतियों की नई कड़ी है। मीडिया भूल सकता है, लेकिन जनता नहीं भूली कि मोदी जी के गुजरात के दिनों में मानसी सोनी की जासूसी कैसे करवाई गई थी।
2017: सुप्रीम कोर्ट में निजता को मौलिक अधिकार मानने के विरोध में खड़े होकर भाजपा सरकार ने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति अपनी अवमानना साबित की।
2018: भाजपा सरकार ने 10 एजेंसियों को बिना न्यायिक निगरानी के किसी भी कंप्यूटर से जानकारी इंटरसेप्ट करने का अधिकार दिया। डीएनए प्रोफाइलिंग बिल ने नागरिकों की अत्यंत निजी जैविक जानकारी को राज्य के स्थायी नियंत्रण का औज़ार बनाने की कोशिश की। सोशल मीडिया हब प्रस्ताव ने डिजिटल बातचीत पर निगरानी और असहमति पर पहरा बिठाने का प्रयास किया। आधार डेटा लीक में 1.1 अरब भारतीयों की निजी जानकारी उजागर हुई, जबकि सरकार दीवारों की मोटाई गिनाकर सुरक्षा का ढोंग कर रही थी।
2019: पेगासस जासूसी कांड में विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, न्यायाधीशों और यहां तक कि केंद्रीय मंत्रियों पर भी जासूसी की गई। श्री राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाकर बताया था कि असहमति रखने वालों को टारगेट किया गया।
2020: नमो ऐप के तहत कई व्हिसलब्लोअर्स और पत्रकारों ने निजी डेटा के लीक और दुरुपयोग की शिकायतें सार्वजनिक कीं, जिससे यह उजागर हुआ कि सरकार ने नागरिकों की निजी जानकारी को एक्सेस, ट्रेड या शोषित होने दिया। 2021 में भाजपा सरकार ने बेहयाई से नागरिकों की निजी जानकारी का व्यापारीकरण किया और वाहन तथा सारथी डेटाबेस का डेटा निजी कंपनियों को बेचकर 100 करोड़ रुपये से अधिक कमाए।
2023: सूचना का अधिकार (RTI) कानून को जानबूझकर कमजोर कर दिया गया, जिससे धारा 8(1)(j) में बदलाव कर नागरिकों से पारदर्शिता मांगने और सरकार को जवाबदेह ठहराने का एक महत्वपूर्ण साधन छीन लिया गया। 2025 में DPDP अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों ने इस निरंकुश नियंत्रण को और मजबूत किया। व्यक्तिगत डेटा तक अबाधित पहुंच देकर, पारदर्शिता को बंद कर, और नागरिकों के अधिकारों को अनिश्चित काल तक टालकर भाजपा ने सुनिश्चित कर दिया है कि राज्य नागरिकों की निगरानी, ट्रैकिंग और मनोवैज्ञानिक हेरफेर बिना रोक-टोक कर सके।
2025: आयकर अधिनियम में किए गए परिवर्तनों ने सरकार को ईमेल, क्लाउड अकाउंट, मैसेजिंग ऐप, सोशल मीडिया, ऑनलाइन बैंकिंग और यहां तक कि IoT उपकरणों तक की छानबीन का अधिकार दे दिया है। सरकार ने आम नागरिकों के डिजिटल जीवन को एक स्थायी निगरानी क्षेत्र में बदल दिया है, जहां हर क्लिक, हर संदेश और हर लेन-देन बिना किसी सहमति के निगरानी में लिया जा सकता है।
सरकार दावा करती है कि प्री-इंस्टॉल्ड संचार साथी ऐप “हानिरहित” है, जबकि यह नागरिकों की निजी बातचीत, बैंकिंग, स्वास्थ्य डेटा और व्यक्तिगत संचार तक में दखल देता है। आज शायद सरकार restraint का दावा करे, लेकिन कल यह ऐप और अधिक डेटा निकालने और निजी गतिविधि की निगरानी करने का माध्यम बन सकता है वह भी बिना सहमति।
एक स्थायी, न मिटाए जा सकने वाला सरकारी ऐप लोक उपयोगिता नहीं, बल्कि निगरानी का दमनकारी औज़ार है। यह निर्देश भाजपा सरकार के संविधानिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर हमलों की लंबी सूची में एक और अध्याय जोड़ता है। और अब कई कठिन, परंतु ज़रूरी प्रश्न सरकार से पूछे जाने चाहिए:
1.क्या यह सच नहीं कि सरकारी नियंत्रण वाले ऐप कथित तौर पर नागरिकों के उपकरणों में फाइलें प्लांट करने के लिए प्रयोग किए गए, जैसे भीमा कोरेगांव प्रकरण में बताया गया?
2.फिर सरकार हर नागरिक के फ़ोन में जबरन ऐप क्यों ठूंस रही है? क्या सुरक्षा कम घुसपैठ वाले तरीकों से सुनिश्चित नहीं की जा सकती थी?
3.क्या भाजपा सरकार ने इस घातक आदेश पर कोई सार्वजनिक परामर्श किया?
4.अगर नहीं, तो 80 करोड़ डिजिटल नागरिकों की सहमति मान लेने का अधिकार उसे किसने दिया?
5.और सबसे अहम नागरिक अपने साथी, परिवार, या मित्रों से क्या बात करते हैं, यह जानने की उत्सुकता सरकार में किस वजह से है?
6.और आख़िर में शयनकक्ष में झांकने को प्रधानमंत्री मोदी “न्यूनतम सरकार” कैसे कहते हैं?
सच यह है कि सरकार की मंशा और पाखंड, उसके अपने ही बेतरतीब बचाव से उजागर हो गए। सरकार जासूसी करते हुए पकड़ी गई, लेकिन मासूमियत का ढोंग कर रही है। संचार मंत्री ने अपनी ही सरकार के आदेश से मुंह मोड़ लिया, जबकि आधिकारिक निर्देश सार्वजनिक है और वह मंत्री के भ्रामक बयान को पूरी तरह झुठलाता है। जब सरकार खुद अपने आदेश और अपने झूठ के बीच फंस जाए, तो यह साबित हो जाता है कि वह सच छुपाने की कोशिश में है क्योंकि उसके पास अपने कदम का कोई वैध औचित्य नहीं।
कांग्रेस पार्टी इस निरंकुश अतिरेक को पूरी तरह खारिज करती है और इसकी तत्काल वापसी की मांग करती है। भारत के नागरिक अपनी निजता, स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर इस तरह का हमला किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।










