सोशल संवाद / डेस्क : पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए और बिना उचित प्राधिकरण के सीधे शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं है।
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क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन्फ्लुएंसर नाज़िया इलाही खान के एक पॉडकास्ट में पैगंबर मोहम्मद और उनके परिवार को लेकर की गई कथित टिप्पणियों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। इसके बाद उनके खिलाफ विभिन्न राज्यों में कई एफआईआर दर्ज की गईं। इसी मामले में एक याचिकाकर्ता ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर तत्काल सुनवाई की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की पीठ ने याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि:
- हर मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट में लाना उचित नहीं है।
- पहले संबंधित प्राधिकरण और कानून के तहत उपलब्ध प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
- ऐसे मामलों को अनावश्यक रूप से सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए।
- कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में सक्षम एजेंसियों को पहले अपना कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए।
पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को भारत की कानूनी व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए और संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई का इंतजार करना चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर क्या कहा कोर्ट ने?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 19(2) के तहत इस अधिकार पर उचित और कानूनी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यदि किसी बयान से सार्वजनिक व्यवस्था, सामाजिक शांति या किसी समुदाय की गरिमा प्रभावित होती है, तो संबंधित कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि प्रत्येक विवाद सीधे शीर्ष अदालत में लाया जाएगा, तो निचली अदालतों और अन्य सक्षम संस्थाओं की भूमिका कमजोर होगी। अदालत ने दोहराया कि भारत की न्यायिक व्यवस्था चरणबद्ध प्रक्रिया पर आधारित है और प्रत्येक स्तर की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी है।










