पीस बॉन्ड कानून की समीक्षा हो, शांतिपूर्ण विरोध दबाने का हथियार न बने: अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू

By Riya Kumari

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पीस बॉन्ड कानून की समीक्षा हो, शांतिपूर्ण विरोध दबाने का हथियार न बने: अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू

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सोशल संवाद / जमशेदपुर : ब्रिटिशकालीन पीस बॉन्ड कानून के इस्तेमाल और उसकी प्रासंगिकता को लेकर अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर ऐसी कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन या लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस व्यवस्था की आवश्यकता, प्रासंगिकता और वर्तमान उपयोग की गंभीर समीक्षा करने की मांग की।

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पीस बॉन्ड की कार्यवाही पर उठाए सवाल

अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू के अनुसार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 126 के तहत शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरवाने की कार्यवाही की जा सकती है। हालांकि, उन्होंने जोर दिया कि इस शक्ति का इस्तेमाल निर्धारित कानूनी शर्तों, ठोस तथ्यों और निष्पक्ष प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि पीस बॉन्ड की कार्यवाही का इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध में शामिल नागरिकों को हतोत्साहित करने या प्रशासन की आलोचना पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो यह गंभीर संवैधानिक चिंता का विषय है। केवल विरोध करना या असहमति जताना अपने-आप में शांति भंग होने का पर्याप्त आधार नहीं होना चाहिए।

अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार महत्वपूर्ण

अधिवक्ता ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) का उल्लेख करते हुए कहा कि ये प्रावधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्वक और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देते हैं। हालांकि, ये अधिकार संविधान में निर्धारित उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं।

उनका कहना है कि किसी भी निवारक कानूनी कार्रवाई को संवैधानिक अधिकारों और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। प्रशासनिक कार्रवाई का आधार संबंधित मामले के तथ्य और परिस्थितियां होनी चाहिए।

औपनिवेशिक कानूनों की समीक्षा की मांग

सुधीर कुमार पप्पू ने ब्रिटिशकालीन कानूनों और उनसे जुड़ी दमनकारी प्रवृत्तियों की समीक्षा कर आवश्यक विधायी सुधार करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य वास्तविक रूप से शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना होना चाहिए, न कि शांतिपूर्ण विरोध या लोकतांत्रिक असहमति को नियंत्रित करना।

उन्होंने लोकतंत्र में नागरिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और विधि के शासन को सर्वोपरि बताते हुए इस व्यवस्था के इस्तेमाल में निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

नेहा बोरा के हस्ताक्षर नहीं करने के फैसले का समर्थन

अपने बयान में अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने नेहा बोरा के हस्ताक्षर नहीं करने के फैसले को सही बताया। हालांकि, उपलब्ध बयान में इस मामले की विस्तृत परिस्थितियों और पीस बॉन्ड की कार्यवाही से जुड़े घटनाक्रम का पूरा विवरण नहीं दिया गया है।

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