सोशल संवाद / डेस्क : आज के दौर में मीडिया की ताकत पहले से कहीं ज्यादा व्यापक और प्रभावशाली हो गई है। ऐसे समय में पत्रकारिता की जिम्मेदारी केवल खबरें देने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि समाज में न्याय, समानता और विकास को आगे बढ़ाने की भी होती है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष Prof. Sanjay Dwivedi का कहना है कि मीडिया को विकास और सुशासन जैसे मुद्दों को अपनी प्राथमिकता में शामिल करना चाहिए।
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विकास पत्रकारिता की बढ़ती जरूरत
जब देश की राजनीति में विकास और सुशासन जैसे विषय प्रमुख हो रहे हैं, तब मीडिया की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। समाज की आकांक्षाओं, बदलावों और जमीनी हकीकत को सामने लाना पत्रकारिता का दायित्व है। हालांकि, मुख्यधारा का मीडिया इन विषयों को अपेक्षित स्थान नहीं दे पा रहा है, जिससे विकास पत्रकारिता को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा।
विविधताओं वाले भारत में चुनौती
भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में विकास के कई आयाम हैं। हर क्षेत्र की अपनी अलग समस्याएं और संभावनाएं हैं। ऐसे में पत्रकारों के लिए यह जरूरी है कि वे इन विविधताओं को समझें और संतुलित रिपोर्टिंग करें। अब विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास भी है।
संचार का असली मतलब
प्रो. द्विवेदी के अनुसार, संचार केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों की आवाज बनना भी है। मीडिया को चाहिए कि वह उन लोगों तक पहुंचे, जिनकी आवाज अक्सर मुख्यधारा से दूर रह जाती है।
मीडिया में केंद्रीकरण पर चिंता
उन्होंने मीडिया में बढ़ते केंद्रीकरण पर भी चिंता जताई और कहा कि क्रॉस मीडिया ओनरशिप जैसे मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। साथ ही, प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाओं को अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है, ताकि मीडिया की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
खबरें कम, सूचनाएं ज्यादा
आज मीडिया में सूचनाओं की भरमार है, लेकिन सार्थक और जनहित से जुड़ी खबरों की कमी साफ नजर आती है। अखबारों और चैनलों में आम जनता और विकास से जुड़े मुद्दों को पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा, जो चिंता का विषय है।
मीडिया की प्राथमिकताओं पर सवाल
आज यह धारणा बनती जा रही है कि विकास और समाज मीडिया की प्राथमिकता में नहीं हैं। जबकि हकीकत यह है कि कोई भी मीडिया, राजनीति या व्यक्ति समाज से बड़ा नहीं हो सकता। यदि मीडिया समाज की वास्तविक चिंताओं से दूर होता है, तो उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।
निष्कर्ष
मीडिया के लिए यह आत्ममंथन का समय है। जब देश विकास और सुशासन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब मीडिया को भी अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित करना होगा। अगर आज इन सवालों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में मीडिया की साख और प्रभाव दोनों पर संकट गहरा सकता है।









