सोशल संवाद / डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने LPG बॉटलिंग प्लांट में नौकरी से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) को महिला को 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। महिला को कथित तौर पर सिर्फ महिला होने के आधार पर रिफिलिंग हेल्पर के पद पर नियुक्ति नहीं दी गई थी।
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महिला को क्यों नहीं दी गई नौकरी?
मामला हरियाणा के गुढ़ा गांव की एक महिला से जुड़ा है। डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली स्थानीय समिति ने IOC के LPG बॉटलिंग प्लांट में रोजगार के लिए 49 लोगों के नामों की सिफारिश की थी। महिला ने रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, सूची में शामिल 43 अन्य उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए, लेकिन महिला को नौकरी नहीं मिली। बाद में यह मामला अदालत तक पहुंचा।
IOC की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान IOC की ओर से दलील दी गई कि रिफिलिंग हेल्पर के काम में LPG सिलेंडर उठाने के साथ-साथ रात की शिफ्ट में काम करना पड़ सकता है। इसी संदर्भ में महिला की नियुक्ति को लेकर सवाल उठाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस आधार पर सवाल उठाया कि क्या सिर्फ महिला होने के कारण उन्हें नौकरी से वंचित किया गया था?
‘महिला होने के कारण समान अवसर से वंचित करना गरिमा के खिलाफ’
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी महिला को केवल उसके जेंडर के आधार पर समान अवसर से वंचित करना उसकी गरिमा के खिलाफ है। अदालत ने यह भी कहा कि महिलाएं घरों में LPG सिलेंडर उठाने और बदलने जैसे काम करती हैं।
महिला अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुकी हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नौकरी देने के बजाय 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया।
ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने महिला को कैजुअल कर्मचारी, प्रशासनिक पद या चपरासी के पद पर समायोजित करने का निर्देश दिया था। हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया।
इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 को प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
महिला ने जारी रखी कानूनी लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान IOC ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध भी किया था, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने महिला की उम्र और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए नौकरी के बजाय मुआवजा देने का फैसला किया।










