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World Tourism Day 2026: विदेशी पर्यटकों को भी भाते हैं भारत के ये 5 आर्ट विलेज, मिट्टी से धागों तक दिखता है हुनर

By Riya Kumari

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World Tourism Day 2026: विदेशी पर्यटकों को भी भाते हैं भारत के ये 5 आर्ट विलेज, मिट्टी से धागों तक दिखता है हुनर
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सोशल संवाद / डेस्क : World Tourism Day 2026: भारत अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, ऐतिहासिक विरासत और संस्कृति के साथ-साथ पारंपरिक हस्तशिल्प के लिए भी दुनियाभर में पहचान रखता है। देश के कई ऐसे गांव हैं, जहां आज भी पीढ़ियों पुरानी कला और कारीगरी जीवित है। World Tourism Day के मौके पर इन आर्ट विलेज को जानना दिलचस्प होगा, जहां मिट्टी, लकड़ी, कपड़े और धागों से अनोखी कलाकृतियां तैयार की जाती हैं।

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रघुराजपुर, ओडिशा

ओडिशा के पुरी के पास स्थित रघुराजपुर अपने पट्टचित्र के लिए प्रसिद्ध है। यहां कपड़े और ताड़ के पत्तों पर पारंपरिक चित्रकारी की जाती है। गांव के कई घर कलाकारों की कार्यशालाओं के रूप में भी काम करते हैं, जिसकी वजह से इसे एक तरह का Living Museum माना जाता है।

पोचमपल्ली, तेलंगाना

तेलंगाना का पोचमपल्ली अपने हथकरघा इकत के लिए जाना जाता है। यहां धागों को पहले बांधकर रंगा जाता है और फिर उनसे कपड़े पर आकर्षक पैटर्न तैयार किए जाते हैं। पोचमपल्ली इकत को 2004 में GI टैग भी मिला था।

जितवारपुर, बिहार

बिहार का जितवारपुर मिथिला या मधुबनी पेंटिंग के लिए प्रसिद्ध है। पारंपरिक रूप से इस कला में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। समय के साथ मधुबनी पेंटिंग ने आधुनिक रूप भी अपनाया है और देश-विदेश में इसकी पहचान बनी है।

निरोना, गुजरात

कच्छ का निरोना गांव अपनी अनोखी रोगन कला के लिए जाना जाता है। इस कला में अरंडी के तेल से तैयार रंगों को कपड़े पर बेहद बारीकी से डिजाइन के रूप में लगाया जाता है। निरोना में रोगन कला के साथ-साथ अन्य पारंपरिक शिल्प भी देखने को मिलते हैं।

चन्नपटना, कर्नाटक

कर्नाटक का चन्नपटना लकड़ी के पारंपरिक खिलौनों के लिए मशहूर है और इसे ‘Toy Town’ भी कहा जाता है। यहां लकड़ी को आकार देकर रंगीन खिलौने और सजावटी वस्तुएं तैयार की जाती हैं। इस पारंपरिक शिल्प को GI टैग भी प्राप्त है।

भारत के आर्ट विलेज क्यों हैं खास?

इन गांवों की खासियत यह है कि यहां कला सिर्फ प्रदर्शन या संग्रहालय तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों के रोजमर्रा के जीवन और आजीविका का हिस्सा है। राजस्थान का मोलेला भी इसका उदाहरण है, जहां 800 साल से अधिक पुरानी टेराकोटा कला आज भी जारी है।

ऐसे आर्ट विलेज पर्यटकों को सिर्फ हस्तशिल्प खरीदने का मौका नहीं देते, बल्कि कलाकारों को काम करते हुए देखने और भारत की पारंपरिक कला को करीब से समझने का अनुभव भी देते हैं।

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