सोशल संवाद / डेस्क : भारत में Sugar की कीमतें पिछले कुछ महीनों में तेजी से बढ़ी हैं। 20 अगस्त 2026 को खुदरा बाजार में चीनी की कीमत करीब 55.70 रुपये प्रति किलो पहुंच गई। एक महीने पहले यही कीमत 48.18 रुपये प्रति किलो थी। यानी एक महीने में चीनी करीब 7.50 रुपये प्रति किलो महंगी हुई है।

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चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पेट्रोल में मिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाला इथेनॉल इसकी एक वजह है? दरअसल, 2025-26 के चीनी वर्ष में करीब 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल बनाने के लिए डायवर्ट किया गया। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक सिर्फ इथेनॉल को चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
एक महीने में 20 फीसदी तक बढ़े Sugar के दाम
रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2026 में भारत में चीनी की कीमतों में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 20 अगस्त को चीनी का खुदरा भाव 55.70 रुपये प्रति किलो था।
वहीं, एक महीने पहले यानी 20 जुलाई को चीनी करीब 48.18 रुपये प्रति किलो बिक रही थी। पिछले साल 20 अगस्त को इसका भाव करीब 46.30 रुपये प्रति किलो था।
Sugar महंगी होने की क्या वजह है?
Sugar की कीमत बढ़ने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें कम उत्पादन, शुरुआती स्टॉक में कमी, बारिश का असर, गन्ने की फसल में बीमारी और त्योहारों के दौरान बढ़ने वाली मांग प्रमुख हैं।
नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के उपाध्यक्ष केतन पटेल के मुताबिक, 2025-26 में भारत में करीब 3.2 करोड़ टन चीनी उत्पादन का अनुमान था, लेकिन वास्तविक उत्पादन करीब 3 करोड़ टन ही रहा।
उन्होंने बताया कि पिछले साल ज्यादा बारिश और उत्तर प्रदेश में गन्ने की CO-0238 किस्म में बीमारी के कारण गन्ने का उत्पादन और शुगर रिकवरी प्रभावित हुई।
शुरुआती स्टॉक भी रहा कम
भारत में हर साल करीब 2.6 करोड़ से 2.8 करोड़ टन चीनी की खपत होती है। आमतौर पर साल के अंत में 60 से 70 लाख टन चीनी का स्टॉक बचा रहता है।
लेकिन 2024-25 के अंत में यह स्टॉक करीब 50 से 50.5 लाख टन ही था। ऐसे में 2025-26 की शुरुआत ही कम स्टॉक के साथ हुई। इसके बाद उत्पादन भी अनुमान से कम रहा।
त्योहारों के कारण बढ़ी मांग
जन्माष्टमी के साथ देश में त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है। त्योहारों के दौरान मिठाई और दूसरे खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ जाती है।
जानकारों के मुताबिक, इस समय बाजार में उपलब्ध चीनी तुरंत बिक रही है। वहीं, कीमतें और बढ़ने की आशंका के कारण कुछ कारोबारी जरूरत से ज्यादा चीनी खरीद रहे हैं। इसे पैनिक बाइंग कहा जाता है।
क्या इथेनॉल से भी Sugar की कीमत बढ़ी?
इथेनॉल को लेकर भी Sugar की कीमत बढ़ने की चर्चा हो रही है। भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया था।
2025-26 के चीनी वर्ष में करीब 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह कुल चीनी उत्पादन का करीब 10 फीसदी है।
गन्ने के रस के अलावा चीनी उत्पादन के दौरान निकलने वाले अलग-अलग प्रकार के मोलासिस से भी इथेनॉल बनाया जाता है।
हालांकि, जानकारों का कहना है कि इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल बढ़ी कीमतों की अकेली वजह नहीं है। कम उत्पादन, कम शुरुआती स्टॉक और त्योहारों की बढ़ती मांग ने भी बाजार पर दबाव बनाया है।
सरकार ने कहा- देश में चीनी की कमी नहीं
केंद्र सरकार का कहना है कि देश में घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है। सरकार ने जुलाई में कहा था कि बाजार में चीनी की कमी की स्थिति नहीं है।
सरकार के मुताबिक, कुछ व्यापारियों और बिचौलियों की जमाखोरी और कागजों पर होने वाले कारोबार के कारण बाजार में कृत्रिम कमी का माहौल बन सकता है। इसी वजह से सरकार ने चीनी के स्टॉक पर नजर बढ़ाई है और निर्यात को लेकर भी कदम उठाए हैं।
कब सस्ती हो सकती है चीनी?
जानकारों के अनुसार जुलाई, अगस्त और सितंबर चीनी उत्पादन का ऑफ-सीजन होता है। इस दौरान हर साल कीमतों में कुछ बढ़ोतरी देखने को मिलती है।
चीनी मिलों के प्रतिनिधि केतन पटेल का कहना है कि अक्टूबर से नई चीनी बाजार में आनी शुरू होगी। इसके बाद कीमतों में गिरावट आने की संभावना है।
तो क्या इथेनॉल ही है चीनी महंगी होने की वजह?
चीनी की कीमत बढ़ने में इथेनॉल की भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि बड़ी मात्रा में चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया गया है। लेकिन मौजूदा महंगाई के पीछे सिर्फ यही एक कारण नहीं है।
कम उत्पादन, शुरुआती स्टॉक में कमी, मौसम का असर, गन्ने की फसल में बीमारी, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग और पैनिक बाइंग जैसे कई कारण मिलकर चीनी की कीमतों को ऊपर ले जा रहे हैं। अक्टूबर से नई फसल और चीनी की उपलब्धता बढ़ने के बाद कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद है।
नोट: यह लेख उपलब्ध सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञों के बयानों पर आधारित है। कीमतें अलग-अलग शहरों और बाजारों में अलग हो सकती हैं।









