सोशल संवाद/जमशेदपुर : महानता केवल बड़ी उपलब्धियां हासिल करने का नाम नहीं है। सच्ची महानता वह है, जो बिना किसी प्रशंसा की उम्मीद के आने वाली पीढ़ियों के लिए मजबूत नींव तैयार करे। सर दोराबजी टाटा इसी सोच और दूरदृष्टि के प्रतीक थे। उन्होंने उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और खेल के क्षेत्र में ऐसा योगदान दिया, जिसकी छाप आज भी देश की प्रगति में दिखाई देती है।

यह भी पढे : आदित्यपुर में विशाल गोराई पर फायरिंग मामले में बड़ी कार्रवाई, दो आरोपी गिरफ्तार
अगस्त 2026 में सर दोराबजी टाटा की 167वीं जयंती के अवसर पर उनके योगदान को याद किया जा रहा है। खास तौर पर भारतीय खेलों में उनके योगदान को इस समय इसलिए भी याद किया जा रहा है, क्योंकि भारत 2027 में भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है।
पिता के अधूरे सपने को बनाया अपना मिशन
सर दोराबजी टाटा, जमशेदजी नसरवानजी टाटा के बड़े बेटे थे। जमशेदजी टाटा ने आत्मनिर्भर और औद्योगिक भारत का सपना देखा था, लेकिन उसे पूरी तरह साकार होते देखने से पहले ही उनका निधन हो गया। इसके बाद उनके अधूरे सपने और विशाल विरासत की जिम्मेदारी दोराबजी टाटा के कंधों पर आई।
उन्होंने इस जिम्मेदारी को चुनौती के बजाय अवसर के रूप में लिया। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित पूंजी और औपनिवेशिक शासन की उदासीनता के बावजूद उन्होंने साकची में बड़े इस्पात संयंत्र के सपने को साकार करने में अहम भूमिका निभाई।
जमशेदपुर के विकास में अहम भूमिका
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को) ने करीब 2.90 लाख टन इस्पात की आपूर्ति की। इसी औद्योगिक केंद्र को बाद में ब्रिटिश शासन ने जमशेदजी टाटा के सम्मान में जमशेदपुर नाम दिया।
बाद में जब कंपनी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही थी, तब सर दोराबजी टाटा और उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई ने उद्यम को बचाने के लिए अपनी निजी संपत्ति तक गिरवी रख दी। इसमें उनका प्रसिद्ध जुबली डायमंड भी शामिल था।
उनके नेतृत्व में इस्पात संयंत्र का करीब पांच गुना विस्तार हुआ। 1920 की बड़ी श्रमिक हड़ताल के दौरान भी उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया और बातचीत के जरिए स्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने का प्रयास किया।
भारतीय खेल आंदोलन को दी नई दिशा
सर दोराबजी टाटा का योगदान केवल उद्योग तक सीमित नहीं था। वह भारत में संगठित खेल और ओलंपिक आंदोलन के शुरुआती समर्थकों में शामिल थे।
उन्होंने 1920 के एंटवर्प ओलंपिक में भारत की ऐतिहासिक भागीदारी के लिए व्यक्तिगत आर्थिक सहयोग दिया और खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया। उनके प्रयासों ने भारत में ओलंपिक आंदोलन को मजबूत आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर 1927 में भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) की स्थापना हुई और सर दोराबजी टाटा इसके पहले अध्यक्ष बने।
आज भी आगे बढ़ रही है उनकी खेल विरासत
सर दोराबजी टाटा की खेल विरासत को आज टाटा स्टील आगे बढ़ा रही है। कंपनी के अनुसार, उसकी 5 विश्वस्तरीय खेल अकादमियां, हाई परफॉर्मेंस सेंटर और 16 प्रशिक्षण एवं फीडर केंद्र 19 खेल विधाओं में प्रतिभाओं को तैयार करने में योगदान दे रहे हैं।
टाटा फुटबॉल अकादमी (TFA) ने अब तक 300 से अधिक कैडेट्स को प्रशिक्षण दिया है, जिनमें 150 से ज्यादा खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व किया है। वहीं, टाटा आर्चरी अकादमी ने पिछले 25 वर्षों में 180 से अधिक कैडेट्स को प्रशिक्षित किया है और देश को 8 ओलंपियन दिए हैं।
नवल टाटा हॉकी अकादमी भी तीन रीजनल डेवलपमेंट सेंटर और 32 ग्रासरूट सेंटर के जरिए हॉकी प्रतिभाओं को आगे बढ़ा रही है।
उद्योग के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी जोर
राष्ट्र निर्माण के प्रति सर दोराबजी टाटा का नजरिया व्यापक था। उन्होंने पश्चिमी घाट में तीन जलविद्युत कंपनियों की स्थापना के जरिए टाटा पावर की नींव मजबूत करने में योगदान दिया। इसके अलावा भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विकास में भी उनका महत्वपूर्ण सहयोग रहा।
उन्होंने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की स्थापना की। आगे चलकर इसी ट्रस्ट के सहयोग से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), टाटा मेमोरियल अस्पताल और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों के विकास में मदद मिली।
1932 में निधन, लेकिन विरासत आज भी जिंदा
सर दोराबजी टाटा का निधन 1932 में हुआ। उनके जाने के बाद देश ने केवल एक उद्योगपति को नहीं खोया, बल्कि ऐसे राष्ट्र निर्माता को खोया, जिसने उद्योग, विज्ञान, स्वास्थ्य और खेल को भारत के भविष्य से जोड़कर देखा।
आज उनकी 167वीं जयंती पर उन्हें याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह उस सोच को समझने का अवसर भी है, जिसमें एक व्यक्ति अपने समय से आगे की सोचकर आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसी संस्थाएं और अवसर तैयार करता है, जो दशकों बाद भी देश को आगे बढ़ाते रहें।









