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इप्टा जमशेदपुर में शेखर मल्लिक की कहानी ‘सहराव’ का प्रभावशाली पाठ

By Riya Kumari

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इप्टा जमशेदपुर में शेखर मल्लिक की कहानी ‘सहराव’ का प्रभावशाली पाठ

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सोशल संवाद / जमशेदपुर : जमशेदपुर में साहित्य और रंगकर्म की सक्रिय संस्था इप्टा जमशेदपुर द्वारा आयोजित कथा गोष्ठी में घाटशिला के चर्चित कहानीकार और उपन्यासकार शेखर मल्लिक ने अपनी बहुचर्चित कहानी ‘सहराव’ का मार्मिक पाठ किया। यह कहानी रंगकर्मियों के जीवन, संघर्ष और पहचान के प्रश्नों को गहराई से सामने लाती है।

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रंगकर्म और पहचान का द्वंद्व

‘सहराव’ मूलतः रंगमंच की उस सच्चाई को उजागर करती है, जहां कला सामूहिक प्रयास (टीम वर्क) का परिणाम होती है, लेकिन मंच के पीछे काम करने वाले कई कलाकारों को उचित पहचान नहीं मिल पाती। कहानी में आदिवासी युवा कानाई और रूपा के माध्यम से उनकी पीड़ा, अंतर्द्वंद्व और अस्तित्व की व्यथा को बेहद संवेदनशीलता से उकेरा गया है।

कहानी यह कड़वा सच सामने रखती है कि सुदूर अंचलों में रहने वाला आदिवासी समुदाय अपनी परंपरा और विरासत को जीता है, जबकि शहरी या आभिजात्य वर्ग अक्सर अपनी कला में आकर्षण और चमक लाने के लिए लोक कलाकारों को मंच पर लाता है। गांव से शहर के मंच तक का यह सफर संघर्ष, उपेक्षा और पहचान के संकट से भरा हुआ है, जिसे ‘सहराव’ प्रभावी ढंग से दर्ज करती है।

बाजारवाद और कला का संबंध

हालांकि कहानी में प्रत्यक्ष रूप से बाजारवाद दिखाई नहीं देता, लेकिन उसकी उपस्थिति रंग निर्देशक सखीकांत के चरित्र के माध्यम से स्पष्ट होती है। वे लोक थिएटर के नाम पर कानाई की प्रतिभा का उपयोग करते हैं, परंतु सार्वजनिक मंच पर उसके योगदान का उल्लेख आवश्यक नहीं समझते। यही नहीं, सुदूर अंचल से आए उस बड़े दल की भूमिका भी अनदेखी रह जाती है, जो इस कला को अपने दैनिक जीवन में जीते हैं।

कहानी इस बात पर भी सवाल उठाती है कि कला ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी योगदान को नकारने की एक लंबी परंपरा रही है। इसे सत्ता संरचना (पावर स्ट्रक्चर) के संदर्भ में देखने की आवश्यकता है, जिसे बाजार के इस दौर में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

प्रभावी संवाद और जीवंत प्रस्तुति

‘सहराव’ की खासियत इसके पात्रों के आपसी संवाद हैं, जो कहानी को जीवंत और प्रभावशाली बनाते हैं। कहानी कला जगत में व्याप्त शोषण, पीड़ा और अंतर्विरोधों से पाठकों और श्रोताओं को परिचित कराती है।

इस कथा-पाठ कार्यक्रम में युवा और बाल रंगकर्मियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कई युवाओं का यह पहला कहानी-पाठ अनुभव था, जिसने उन्हें साहित्य और रंगमंच की नई समझ दी।

प्रमुख उपस्थितजन

कार्यक्रम में गोमहेड से रामचंद्र मार्डी और उर्मिला हांसदा, जलेस से शैलेन्द्र अस्थाना और बरुण प्रभात, पथ से मो. निज़ाम, छवि, खुर्शीद, सत्यम, नेहा, विकास, रूपेश, आशीष, सुमन, पूजा, अमितेश, प्रलेस से कृपाशंकर, विनय कुमार, नियाज़ अख़्तर, अहमद बद्र, शशि कुमार, इप्टा घाटशिला से ज्योति और स्नेहज, जमशेदपुर के लिटिल इप्टा के साथी अंजना, श्वेता, प्रशांत, अर्पिता तथा युवा साथी रमन और संजय सोलोमन उपस्थित रहे।

इप्टा जमशेदपुर की यह कथा गोष्ठी न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही, बल्कि इसने रंगकर्म, लोक कला, आदिवासी पहचान और बाजारवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर भी विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया। ‘सहराव’ आज के समय में कला और पहचान के सवालों को मजबूती से सामने रखने वाली एक महत्वपूर्ण कहानी साबित होती है।

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