सोशल संवाद/डेस्क : Google ने शनिवार को अपने डूडल के जरिए भारत के लोकप्रिय व्यंजन इडली को समर्पित किया। इस खास एनिमेटेड डूडल में केले के पत्ते पर रखी गर्मागर्म इडलियों और भाप से भरे बर्तनों के दृश्य दिखाए गए, जो दक्षिण भारतीय रसोई की आत्मा को जीवंत करते हैं। यह डूडल Google की “फूड एंड ड्रिंक” सीरीज़ का हिस्सा है, जिसके तहत दुनिया के स्थानीय व्यंजनों को सम्मान दिया जाता है।
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Google डूडल का उद्देश्य भारतीय खाद्य संस्कृति, विशेष रूप से तमिल और दक्षिण भारतीय परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाना है। भले ही विश्व इडली दिवस हर साल 30 मार्च को मनाया जाता है, लेकिन Google ने अक्टूबर में इसे प्रस्तुत कर भारत के समृद्ध खानपान की विविधता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित किया है।
इडली: स्वाद, स्वास्थ्य और परंपरा का संगम
इडली सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। यह चावल और उड़द दाल के घोल को फर्मेंट कर भाप में पकाई जाती है, जिससे यह बेहद हल्की और सुपाच्य बनती है। दक्षिण भारत में इसे चटनी, सांभर और फिल्टर कॉफी के साथ परोसा जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इडली को पौष्टिक और संतुलित भोजन बताया है। फर्मेंटेशन की प्रक्रिया में चावल का स्टार्च टूट जाता है, जिससे यह पाचन में आसान हो जाता है। इसलिए इडली को “आदर्श भारतीय नाश्ता” कहा जाता है।
इडली की ऐतिहासिक जड़ें
इडली की उत्पत्ति को लेकर कई मत हैं, लेकिन इसका सबसे पुराना उल्लेख 9वीं सदी के कन्नड़ साहित्य में मिलता है। शिवकोटिआचार्य द्वारा रचित ‘वड्डाराधने’ (920 ईस्वी) में ‘इडलीगे’ नामक व्यंजन का जिक्र है। तब इसे उड़द दाल और छाछ के मिश्रण से बनाया जाता था, हालांकि आधुनिक इडली की तरह इसे भाप में नहीं पकाया जाता था।

बाद में 11वीं सदी में राजा सोमेश्वर तृतीय ने अपने विश्वकोश मानसोल्लास में इडली का विस्तृत उल्लेख किया। इसी प्रकार तमिल साहित्य ‘मैस्सापुराणम’ (17वीं सदी) और गुजराती ग्रंथ वरनका समुच्चय (1520 ईस्वी) में भी इडली का वर्णन मिलता है।
इन ग्रंथों से स्पष्ट है कि इडली न केवल दक्षिण भारत में बल्कि पश्चिमी और उत्तर भारतीय क्षेत्रों में भी अपनी जगह बना चुकी थी।
भाप वाले व्यंजनों की परंपरा
वैदिक काल के ग्रंथों में भी भाप में पकाए जाने वाले खाद्य पदार्थों का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में “करव” नामक व्यंजन का वर्णन है, जिसे जौ और दही के मिश्रण से भाप में पकाया जाता था। इसी तरह “यवद्यूप” नामक भोजन छाछ में जौ को भाप से पकाकर तैयार किया जाता था।हालांकि यह कहना कठिन है कि ये व्यंजन इडली ही थे, परंतु इन्हें भाप में पकाने की तकनीक निश्चित रूप से आधुनिक इडली की पूर्वज मानी जा सकती है।
इंडोनेशिया से भारत तक का सफर: एक दिलचस्प दावा
कई खाद्य इतिहासकारों के अनुसार, इडली का वर्तमान स्वरूप इंडोनेशिया से भारत आया। भारतीय खाद्य इतिहास पर शोध करने वाले वैज्ञानिक के.टी. आचार्य ने अपनी किताब Indian Food: A Historical Companion में लिखा है कि इडली का आधुनिक संस्करण इंडोनेशिया में प्रचलित “केडली” से प्रेरित है।
एक किंवदंती के अनुसार, किसी दक्षिण भारतीय राजा की बहन की शादी इंडोनेशिया के एक शाही परिवार में हुई थी। दहेज में गए भारतीय रसोइयों ने वहां “केडली” नाम से यह व्यंजन तैयार किया, जो बाद में भारत लौटते समय फिर से लोकप्रिय हुआ।

इंडोनेशिया में आज भी यह व्यंजन “केडली” नाम से नाश्ते में खाया जाता है।
- इडली के क्षेत्रीय रूप और विविधताएं
- भारत के विभिन्न राज्यों में इडली ने कई रूप लिए।
- गोवा और कोंकण में इसे “सन्ना” या “हितली” कहा जाता है, जिसमें खमीर डालकर फुलाया जाता है।
- ओडिशा में “एंडुरी पिठा” नामक व्यंजन इडली जैसा ही है, जिसे केले के पत्तों में लपेटकर भाप में पकाया जाता है।
- गुजरात में “इडरा” या “इडरी” नामक स्नैक इडली का ही एक स्वरूप है।
- इन सभी रूपों में एक समानता है—भाप में पकाना और चावल या दाल का फर्मेंटेड घोल प्रयोग करना।
दक्षिण से उत्तर भारत तक का सफर
तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश की पारंपरिक रसोई में इडली मुख्य नाश्ता मानी जाती है। लेकिन समय के साथ यह व्यंजन पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। उत्तर भारत में भी अब इडली होटल, ढाबों और घरों की मेन्यू में नियमित रूप से शामिल है।
इडली ने केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं तोड़ीं, बल्कि सामाजिक वर्गों के बीच भी समानता का प्रतीक बन गई। चाहे पांच सितारा होटल हो या रेलवे स्टेशन, इडली हर जगह एक समान स्वाद और सादगी के साथ मिलती है।
आधुनिक युग में इडली का महत्व
आज के फास्ट-फूड दौर में भी इडली अपनी जगह बनाए हुए है। फिटनेस प्रेमी इसे “गिल्ट-फ्री” भोजन के रूप में अपनाते हैं। वहीं बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह हल्का और पौष्टिक विकल्प साबित होती है।
शहरी जीवनशैली में अब “रेडी-टू-कुक” इडली मिक्स और “इंस्टेंट इडली मेकर” जैसे प्रोडक्ट्स भी बाजार में मौजूद हैं। लेकिन पारंपरिक तरीके से बनी इडली का स्वाद और सुगंध अब भी बेमिसाल है।
Google डूडल का संदेश
Google का यह कदम सिर्फ एक भोजन को सम्मान देने तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय खानपान की समृद्ध विरासत को विश्व पटल पर स्थापित करने का प्रयास है। यह दिखाता है कि एक साधारण सा व्यंजन, जब संस्कृति और परंपरा से जुड़ा हो, तो वह वैश्विक पहचान भी हासिल कर सकता है।

इडली भारतीय खानपान का वह प्रतीक बन चुकी है, जो सादगी, स्वास्थ्य और परंपरा को एक साथ समेटे हुए है। चाहे वह मंदिरों का प्रसाद हो या घर की सुबह का नाश्ता — इडली भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा है। Google का डूडल इस बात की पुष्टि करता है कि भारतीय व्यंजन अब केवल प्लेट तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं।










