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भारत का हेल्थकेयर सेक्टर खत्म होने की कगार पर है यह बात भारत की एक पार्लियामेंट्री कमेटी ने भी मानी है।

By Muskan Thakur

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सोशल संवाद/डेस्क : प्रमुख न्यूज़ की हाल ही में जारी एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में होने वाली लगभग 44% इंसानों की सर्जरी नकली, फ्रॉड या गैर-ज़रूरी होती हैं। इसका मतलब है कि देश में होने वाली लगभग आधी सर्जरी मरीज़ों या सरकार को लूटने के लिए की जाती हैं।

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रिपोर्ट के मुताबिक:

हार्ट सर्जरी – 55%

हिस्टेरेक्टॉमी – 48%

कैंसर सर्जरी – 47%

घुटने का रिप्लेसमेंट – 48%

सिजेरियन डिलीवरी – 45%

कंधे, रीढ़ की हड्डी, वगैरह और कई दूसरी सर्जरी – नकली या गैर-ज़रूरी होती हैं।

महाराष्ट्र के कई जाने-माने अस्पतालों पर किए गए एक सर्वे के मुताबिक, बड़े अस्पतालों में सीनियर डॉक्टरों को हर महीने ₹1 करोड़ तक मिलते हैं।

कारण: जो डॉक्टर ज़्यादा टेस्ट, इलाज, हॉस्पिटल में भर्ती या सर्जरी लिखते हैं, उन्हें ज़्यादा पैसे मिलते हैं चाहे वे ज़रूरी हों या नहीं।

(सोर्स: BMJ ग्लोबल हेल्थ)

रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ हॉस्पिटल मरे हुए मरीज़ों का इलाज ऐसे कर रहे हैं जैसे वे ज़िंदा हों और इलाज के नाम पर उनसे पैसे वसूल रहे हैं यह एक घिनौना काम है। एक घटना में, एक बड़े हॉस्पिटल ने 14 साल के लड़के को एक महीने तक वेंटिलेटर पर रखा, जबकि वह मर चुका था।

जब बाद में उसे मरा हुआ घोषित किया गया, तो हॉस्पिटल को दोषी पाया गया और परिवार को ₹5 लाख का मुआवज़ा दिया गया लेकिन क्या कोई उनकी मानसिक तकलीफ़ के लिए उन्हें मुआवज़ा दे सकता है?

कुछ हॉस्पिटल दावा करते हैं कि मरे हुए मरीज़ों को तुरंत सर्जरी की ज़रूरत है, परिवार वालों से पैसे लेते हैं और बाद में कह देते हैं कि वे “ऑपरेशन के दौरान मर गए।”

इस तरह, बहुत बड़ी रकम लूटी जाती है।

(सोर्स: डिसेंटिंग डायग्नोसिस – डॉ. गद्रे और डॉ. शुक्ला)

हेल्थ इंश्योरेंस (मेडिकल क्लेम) फ्रॉड

यह भी उतना ही डरावना है। वैसे तो भारत में करीब 68% लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस है, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर उनके क्लेम या तो रिजेक्ट कर दिए जाते हैं या उनका थोड़ा पेमेंट किया जाता है। बाकी का खर्च परिवार उठाता है। करीब 3,000 जाने-माने हॉस्पिटल को इंश्योरेंस कंपनियों ने नकली क्लेम की वजह से ब्लैकलिस्ट कर दिया है। कोविड के समय में कई बड़े हॉस्पिटल ने नकली कोविड केस बनाए और इंश्योरेंस कंपनियों को धोखा दिया। ह्यूमन ऑर्गन ट्रैफिकिंग यह बड़े पैमाने पर हो रहा है।

2019 में इंडियन एक्सप्रेस ने एक घटना का खुलासा किया था कानपुर की संगीता कश्यप नाम की एक महिला को नौकरी का झांसा देकर दिल्ली के एक हॉस्पिटल में ले जाया गया। उसे “हेल्थ चेकअप” के बहाने फोर्टिस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। खुशकिस्मती से, डॉक्टरों के “डोनर” शब्द का इस्तेमाल करने के बाद वह भाग निकली। उसकी शिकायत के बाद, डॉक्टरों, स्टाफ और पुलिस अधिकारियों से जुड़े एक इंटरनेशनल ऑर्गन ट्रैफिकिंग रैकेट का पर्दाफाश हुआ। हॉस्पिटल रेफरल फ्रॉड कुछ डॉक्टर मरीज़ों को गंभीर बीमारी बताकर बड़े हॉस्पिटल में रेफर कर देते थे। अपोलो, फोर्टिस और एपेक्स जैसे हॉस्पिटल ये रेफरल प्रोग्राम चलाते हैं।

उदाहरण के लिए, मुंबई के कोकिलाबेन हॉस्पिटल के ऑफर:

  • अगर आप 40 मरीज़ों को रेफर करते हैं, तो आपको ₹1 लाख मिलेंगे,
  • 50 मरीज़ों के लिए, आपको ₹1.5 लाख मिलेंगे,
  • 75 मरीज़ों के लिए, आपको ₹2.5 लाख मिलेंगे।
  • मरीज़ की हालत चाहे जो भी हो रेफरल फीस सीधे डॉक्टर के बैंक अकाउंट में क्रेडिट हो जाती है।
  • डायग्नोस्टिक टेस्ट फ्रॉड

यह हज़ारों करोड़ रुपये का बिज़नेस है।

बेंगलुरु में एक जानी-मानी लैब पर इनकम टैक्स की रेड में, ₹100 करोड़ कैश और 3.5 kg सोना ज़ब्त किया गया ये सब डॉक्टरों को रिश्वत देने के लिए था।

डॉक्टर गैर-ज़रूरी टेस्ट लिखते थे और 40–50% कमीशन लेते थे।
ज़्यादातर टेस्ट पेपर-बेस्ड होते हैं। इसीलिए, भारत में 2 लाख से ज़्यादा लैब होने के बावजूद, सिर्फ़ 1,000 ही सर्टिफाइड हैं।

फार्मास्यूटिकल कंपनियों का करप्शन

लगभग 20-25 बड़ी फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ हर साल डॉक्टरों पर ₹1,000 करोड़ खर्च करती हैं।
डोलो टैबलेट बनाने वाली कंपनी भी कोविड के दौरान ऐसे ही एक स्कैम में पकड़ी गई थी।

डॉक्टरों को उनकी दवाएँ लिखने के लिए कैश, विदेश ट्रिप और 5-स्टार होटलों में लग्ज़री स्टे दिया जाता है।
उदाहरण के लिए, USV Ltd. हर डॉक्टर को ₹3 लाख कैश या ऑस्ट्रेलिया/अमेरिका का टूर देती है।

हॉस्पिटल – फार्मास्यूटिकल कंपनी रैकेट

कई कंपनियाँ हॉस्पिटल को कम कीमत पर दवाएँ और इक्विपमेंट बेचती हैं, लेकिन हॉस्पिटल मरीज़ों को उन्हें 10 गुना ज़्यादा कीमत पर बेचते हैं।

एक उदाहरण
EMCURE की बनाई कैंसर की दवा टेमिक्योर हॉस्पिटल को ₹1,950 में बेची गई,
मरीज़ों से ₹18,645 लिए गए।

मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (MCI)

2016 की एक रिपोर्ट में, सरकार की बनाई एक कमिटी ने कहा कि नए मेडिकल कॉलेजों को मंज़ूरी देने के बावजूद, MCI डॉक्टरों और अस्पतालों पर नज़र रखने में पूरी तरह से नाकाम रही है।

MCI के नियम (जिनका अक्सर उल्लंघन होता है) में ये शामिल हैं:

  1. डॉक्टरों को सिर्फ़ जेनेरिक दवाएँ लिखनी चाहिए, ब्रांडेड नहीं।
  2. इलाज से पहले फ़ीस की जानकारी बतानी चाहिए।
  3. हर टेस्ट या इलाज से पहले मरीज़ की मंज़ूरी ज़रूरी है।
  4. मरीज़ का रिकॉर्ड कम से कम 3 साल तक स्टोर किया जाना चाहिए।
  5. जो डॉक्टर गलत या नाकाबिल तरीके से काम करते हैं, उनकी रिपोर्ट की जानी चाहिए।

सरकारी स्कीमों में भ्रष्टाचार

फ़ायरफ़ाइटर और एक्स-सर्विसमैन जैसे लोग भी सरकारी स्कीमों के तहत फ़र्ज़ी हॉस्पिटल एडमिशन के शिकार होते हैं।

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