सोशल संवाद / रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी का आदेश अदालत द्वारा निरस्त कर दिया जाता है और नियोक्ता तय समय में दोबारा विभागीय कार्रवाई पूरी नहीं करता, तो उस कर्मचारी पर ‘नो वर्क, नो पे’ (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत लागू नहीं होगा।
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हाईकोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी को काम से दूर रखने के लिए स्वयं नियोक्ता जिम्मेदार हो, तब उसे वेतन, पेंशन और अन्य सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी संस्था या व्यक्ति अपने ही गलत कार्य का लाभ नहीं उठा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला बैजनाथ महतो से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 1981 में विस्थापित व्यक्ति के रूप में सीसीएल (सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड) में नौकरी मिली थी। वर्ष 1989 में उनके खिलाफ चोरी का मामला दर्ज होने के बाद उन्हें निलंबित कर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। बाद में आपराधिक मुकदमे में बैजनाथ महतो बरी हो गए। इसके बाद उन्होंने अपनी बर्खास्तगी को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।
2009 में हाईकोर्ट ने रद्द कर दी थी बर्खास्तगी
साल 2009 में हाईकोर्ट ने बैजनाथ महतो की बर्खास्तगी को अवैध मानते हुए उसे निरस्त कर दिया था। साथ ही सीसीएल को तीन महीने के भीतर नए सिरे से विभागीय कार्रवाई पूरी करने का निर्देश भी दिया था। हालांकि, अदालत के आदेश के बावजूद सीसीएल ने वर्षों तक न तो विभागीय जांच पूरी की और न ही कर्मचारी को समय पर सेवा में बहाल किया।
2015 में हुई पुनर्बहाली, फिर उसी साल सेवानिवृत्त
करीब छह साल की देरी के बाद 15 जनवरी 2015 को बैजनाथ महतो की पुनर्बहाली की गई। इसके कुछ ही महीनों बाद 30 नवंबर 2015 को वे सेवानिवृत्त हो गए।
बाद में सीसीएल ने 24 दिसंबर 2014 के आदेश का हवाला देते हुए उन्हें बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया, जिसके खिलाफ उन्होंने फिर हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने सीसीएल का आदेश किया रद्द
मामले की सुनवाई के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने सीसीएल के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें बैजनाथ महतो को बकाया वेतन देने से इनकार किया गया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब बर्खास्तगी का आदेश पहले ही निरस्त किया जा चुका था और नियोक्ता समय पर विभागीय कार्रवाई पूरी करने में विफल रहा, तब कर्मचारी को वेतन से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।
छह सप्ताह में सभी बकाया भुगतान का निर्देश
हाईकोर्ट ने सीसीएल को निर्देश दिया कि बैजनाथ महतो को 1989 से पुनर्बहाली तक का बकाया वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट तथा अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभ छह सप्ताह के भीतर भुगतान किए जाएं।
अदालत की अहम टिप्पणी
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि बैजनाथ महतो लगातार अपने अधिकारों के लिए अदालत में संघर्ष करते रहे और उन्होंने कभी भी नौकरी पर लौटने की इच्छा नहीं छोड़ी। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने काम करने की इच्छा नहीं दिखाई।
अदालत ने दोहराया कि जब कर्मचारी को काम से दूर रखने के लिए स्वयं नियोक्ता जिम्मेदार हो, तब ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।









