सोशल संवाद / डेस्क : भारत के महान चिकित्सक, आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी के जनक और ‘सर्जरी के पितामह’ माने जाने वाले महर्षि सुश्रुत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ी पहचान मिली है। यूनाइटेड किंगडम (UK) के प्रतिष्ठित ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग’ में महर्षि सुश्रुत की 90 किलोग्राम वजनी कांस्य (ब्रॉन्ज) प्रतिमा का भव्य अनावरण किया गया।
1505 में स्थापित यह संस्थान दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े सर्जिकल संस्थानों में से एक है, जिसके 140 से अधिक देशों में 33,000 से ज्यादा सदस्य हैं। प्रतिमा को कॉलेज के प्रतिष्ठित प्लेफेयर ऑडिटोरियम में स्थापित किया गया है।
तेलुगु मूल के सर्जन प्रोफेसर चंद्रा चेरुवू की ऐतिहासिक पहल
इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का नेतृत्व यूके में कार्यरत भारतीय मूल के प्रसिद्ध सर्जन प्रोफेसर चंद्रा चेरुवू ने किया। उनकी पहल और वर्षों की मेहनत के परिणामस्वरूप महर्षि सुश्रुत को वैश्विक स्तर पर ‘फादर ऑफ सर्जरी’ के रूप में सम्मानित किया जा रहा है। यह प्रतिमा चेरुवू फैमिली फाउंडेशन द्वारा दान की गई है, जबकि इसका निर्माण तमिलनाडु के एक प्रसिद्ध मूर्तिकार ने किया है।
अंतरराष्ट्रीय हस्तियों की रही मौजूदगी

प्रतिमा अनावरण समारोह में एडिनबर्ग स्थित भारत के महावाणिज्य दूत सिद्धार्थ मलिक, रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग की अध्यक्ष प्रोफेसर क्लेयर मैकनॉट, पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर रोवन पार्क्स, कैलिफोर्निया कॉलेज ऑफ आयुर्वेद के संस्थापक प्रोफेसर मार्क हेल्परन समेत भारत, अमेरिका और ब्रिटेन की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।
‘महर्षि सुश्रुत: ए कम्पेंडियम – फादर ऑफ सर्जरी’ पुस्तक का विमोचन
इस अवसर पर प्रोफेसर चंद्रा चेरुवू ने साक्ष्यों और ऐतिहासिक शोध पर आधारित पुस्तक ‘Maharishi Sushruta: A Compendium – Father of Surgery’ का भी विमोचन किया। इस पुस्तक में दुनिया भर के आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा क्षेत्र के 36 विशेषज्ञों ने विस्तार से बताया है कि महर्षि सुश्रुत की चिकित्सा पद्धतियां और सिद्धांत आज भी 21वीं सदी में प्रासंगिक हैं।
रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग द्वारा इस पुस्तक और प्रतिमा को स्वीकार किए जाने को महर्षि सुश्रुत को विश्व स्तर पर ‘सर्जरी के पितामह’ के रूप में मान्यता मिलने का महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
2600 साल पहले की थी आधुनिक सर्जरी की नींव
महर्षि सुश्रुत लगभग 2600 वर्ष पहले भारत में हुए थे। उन्हें दुनिया का पहला सर्जन माना जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्होंने 300 से अधिक प्रकार की शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का वर्णन किया था और 124 प्रकार के सर्जिकल उपकरणों का विकास किया था।
उन्होंने अपने ज्ञान को ‘सुश्रुत संहिता’ में संकलित किया, जिसे दुनिया का पहला सर्जरी ग्रंथ माना जाता है। विशेष रूप से नाक के पुनर्निर्माण (Rhinoplasty) की तकनीक, जिसे आज आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी का आधार माना जाता है, उसका उल्लेख भी सुश्रुत संहिता में मिलता है।
चिकित्सा नैतिकता और प्रशिक्षण के भी थे अग्रदूत
विशेषज्ञों के अनुसार महर्षि सुश्रुत ने चिकित्सा नैतिकता, सर्जिकल प्रशिक्षण, रोगी देखभाल और चिकित्सकीय अनुशासन के ऐसे मानक स्थापित किए थे, जो आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था से सदियों पहले अस्तित्व में थे। उन्होंने सामान्य सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स, स्त्री रोग, यूरोलॉजी और विष विज्ञान जैसे कई चिकित्सा क्षेत्रों को व्यवस्थित रूप दिया था।
युवा सर्जनों के लिए छात्रवृत्ति की भी घोषणा
प्रतिमा अनावरण के साथ ही प्रोफेसर चंद्रा चेरुवू ने अपने पिता दिवंगत डॉ. सी.एस. शास्त्री की स्मृति में ‘चेरुवू फैमिली लेगेसी ग्रांट’ के तहत दो स्थायी वार्षिक ट्रैवलिंग सर्जिकल स्कॉलरशिप की भी शुरुआत की है। इन छात्रवृत्तियों के माध्यम से युवा सर्जनों को दुनिया के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।










