सोशल संवाद / डेस्क: पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और उसके बाद सरकारी योजनाओं पर लगी रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शुक्रवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा कि वोटर लिस्ट में से नाम हटने मात्र से किसी भी व्यक्ति की नागरिकता खत्म नहीं हो जाती है। इस मामले में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय विशेष बेंच ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता प्रसनजीत बोस की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने पैरवी की। अदालत को बताया गया कि पश्चिम बंगाल सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर उन लोगों को पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के तहत मिलने वाली अन्नपूर्णा योजना जैसी जरूरी सरकारी योजनाओं का लाभ देने से मना कर दिया है जिनका नाम वोटर लिस्ट से हट गया है। इतना ही नहीं, ऐसे परिवारों को जाति प्रमाणपत्र देने से भी इनकार किया जा रहा है, जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। याचिका में मांग की गई है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के कारण जिन लोगों के नाम कटे हैं, उनकी नागरिकता पर अंतिम फैसला होने तक राशन और अन्य सभी सरकारी सुविधाएं मिलती रहनी चाहिए।
वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में ट्रिब्यूनलों की सुस्त कार्यप्रणाली का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने बताया कि नागरिकता से जुड़े लगभग 34 लाख मामले अभी भी लटके हुए हैं, जबकि अब तक सिर्फ 38 हजार मामलों का ही निपटारा हो सका है। इस वक्त राज्य में केवल 19 ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं। याचिका में मांग की गई है कि ट्रिब्यूनलों के कामकाज को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए और उनके सभी आदेशों व नियमों को वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए। साथ ही कोर्ट से यह हस्तक्षेप भी मांगा गया है कि जिन लोगों के पास पासपोर्ट जैसे भारत सरकार के वैध दस्तावेज मौजूद हैं, उनसे नागरिकता साबित करने के लिए बार-बार दूसरे दस्तावेज न मांगे जाएं।
अगर आंकड़ों की बात करें तो स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। ड्राफ्ट लिस्ट आने से पहले राज्य में कुल 7.66 करोड़ वोटर्स थे, जो अब घटकर 7.08 करोड़ रह गए हैं। इस प्रक्रिया में करीब 58.20 लाख नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं, जो कुल वोटर्स का लगभग 7.6 प्रतिशत है। यानी हर 100 में से करीब 8 वोटर्स का नाम सूची से बाहर हुआ है। हालांकि चुनाव आयोग के मुताबिक हटाए गए इन नामों में से 24.17 लाख वोटर्स मृत पाए गए हैं और 1.38 लाख वोटर्स डुप्लीकेट या फर्जी थे। वहीं सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 32.65 लाख वोटर्स ऐसे हैं जो या तो दूसरी जगह शिफ्ट हो गए, लापता हैं या अन्य कारणों से हटाए गए हैं। अदालत अब इसी बात की जांच कर रही है कि जब तक नागरिकता पर अंतिम मुहर न लगे, तब तक इन लोगों के बुनियादी अधिकारों का हनन न हो।










