सोशल संवाद / डेस्क : देश में मेडिकल शिक्षा को लेकर नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने बड़ा बदलाव किया है। नए नियमों के तहत अब कंपनीज एक्ट, 2013 के अंतर्गत पंजीकृत कोई भी कंपनी मेडिकल कॉलेज खोल सकेगी। पहले यह अनुमति केवल सेक्शन-8 (Non-Profit) कंपनियों तक सीमित थी।
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सरकार का मानना है कि इस बदलाव से निजी निवेश बढ़ेगा, नए मेडिकल कॉलेज खुलेंगे और मेडिकल सीटों की संख्या में इजाफा होगा। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इससे मेडिकल शिक्षा की फीस को लेकर नई बहस भी शुरू हो सकती है।
क्या था पुराना नियम?
अब तक केवल सेक्शन-8 कंपनियां, ट्रस्ट और सोसाइटी ही मेडिकल कॉलेज स्थापित कर सकते थे। सेक्शन-8 कंपनियां नॉन-प्रॉफिट (Non-Profit) होती हैं, यानी संस्था की आय को केवल उसके विकास या सामाजिक कार्यों में ही लगाया जा सकता है। मुनाफे का वितरण नहीं किया जा सकता।
अब क्या बदला?
NMC के नए नियमों के अनुसार अब कंपनीज एक्ट, 2013 के तहत पंजीकृत किसी भी कंपनी को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति होगी। यानी अब लाभ कमाने वाली (For-Profit) कंपनियां भी निर्धारित नियमों का पालन करते हुए मेडिकल कॉलेज स्थापित कर सकेंगी।
सरकार ने बदलाव की क्या वजह बताई?
सरकार का कहना है कि नॉन-प्रॉफिट की अनिवार्यता के कारण कई बड़ी कंपनियां मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करने से पीछे हट रही थीं। साथ ही, कई संस्थानों में मुनाफा अप्रत्यक्ष रूप से कमाया जा रहा था। ऐसे में कानूनी रूप से अनुमति मिलने पर निवेश बढ़ेगा और सरकार को कर (Tax) का भी लाभ मिलेगा।
पहले भी खुल चुका है प्राइवेट लिमिटेड मेडिकल कॉलेज
मई 2017 में वेदांता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, पालघर देश का पहला प्राइवेट लिमिटेड मेडिकल कॉलेज बना था। शुरुआत में संस्थान ने फीस तय करने में स्वतंत्रता की बात कही थी, लेकिन बाद में उसे सरकारी नियमों का पालन करना पड़ा।
वर्ष 2025 में इस कॉलेज की मैनेजमेंट कोटा सीट की फीस लगभग 15.7 लाख रुपये प्रति वर्ष थी, जो राज्य के सबसे महंगे मेडिकल कॉलेजों में शामिल रही।
फीस को लेकर बढ़ सकती है चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियम से निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या तो बढ़ सकती है, लेकिन यदि फीस नियंत्रण की व्यवस्था मजबूत नहीं रही, तो छात्रों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ सकता है। फिलहाल देश के कई डीम्ड यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेजों की फीस काफी अधिक है। इनमें सस्ती फीस वाली सीटों का कोटा भी नहीं होता, जिससे मेडिकल शिक्षा आम छात्रों की पहुंच से बाहर हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का क्या रहा है रुख?
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 और 2002 के अपने महत्वपूर्ण फैसलों में कहा था कि शिक्षा एक सेवा और चैरिटी का क्षेत्र है, न कि मुनाफा कमाने का व्यवसाय। अदालत ने संस्थानों को केवल विकास और विस्तार के लिए उचित अधिशेष (Surplus) रखने की अनुमति दी थी। हालांकि, बदलते समय और बढ़ती मेडिकल सीटों की जरूरत को देखते हुए सरकार ने नियमों में बदलाव किया है।
छात्रों पर क्या होगा असर?
- देश में निजी निवेश बढ़ सकता है।
- नए मेडिकल कॉलेज खुलने से MBBS सीटों की संख्या बढ़ सकती है।
- मेडिकल शिक्षा तक पहुंच आसान हो सकती है।
- लेकिन निजी संस्थानों की फीस बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी।
- भविष्य में फीस नियंत्रण और पारदर्शिता सबसे बड़ा मुद्दा हो सकता है।









