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POCSO Act के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, कानून के संतुलित उपयोग की जरूरत: अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू

By Riya Kumari

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POCSO Act के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, कानून के संतुलित उपयोग की जरूरत: अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू

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सोशल संवाद / जमशेदपुर: सामाजिक चिंतक एवं अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act, 2012) के दुरुपयोग को लेकर हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन कानून का उपयोग उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप और न्यायसंगत तरीके से होना चाहिए।

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उन्होंने कहा कि POCSO Act, 2012 बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और लैंगिक अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। इस कानून का मूल उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना है और इसकी आवश्यकता पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या जताई चिंता?

सुधीर कुमार पप्पू ने बताया कि ‘In Re: Right to Privacy of Adolescents’ मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि कुछ मामलों में POCSO Act का इस्तेमाल उन परिस्थितियों में भी किया जा रहा है, जहां वास्तविक रूप से यौन शोषण का मामला नहीं होता।

उन्होंने कहा कि अदालत ने सुनवाई के दौरान माना कि 15 से 18 वर्ष की आयु किशोरावस्था का महत्वपूर्ण चरण होता है, जहां भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक विकास के दौरान आकर्षण और रिश्ते स्वाभाविक रूप से विकसित हो सकते हैं। न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि यदि दो किशोर अपनी इच्छा से घर छोड़कर साथ चले जाते हैं, तो ऐसे मामलों को राज्य किस प्रकार नियंत्रित कर सकता है।

पारिवारिक सम्मान के नाम पर दर्ज हो रहे मामले

सुधीर कुमार पप्पू के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि कई मामलों में माता-पिता पारिवारिक सम्मान या सामाजिक दबाव के कारण सहमति से बने किशोर प्रेम संबंधों या घर से भागने की घटनाओं में भी POCSO के तहत शिकायत दर्ज करा देते हैं।

उन्होंने कहा कि बाद में अदालत कई मामलों में आरोपियों को बरी कर देती है, लेकिन तब तक गिरफ्तारी, मुकदमे, सामाजिक बदनामी और मानसिक तनाव जैसी परिस्थितियां किशोरों के लिए गंभीर परिणाम बन चुकी होती हैं।

POCSO में 18 वर्ष से कम आयु का हर व्यक्ति ‘बच्चा’

उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति ‘बच्चा’ माना जाता है। ऐसे में यदि दो नाबालिग किशोर आपसी सहमति से किसी संबंध में हों, तब भी उनकी सहमति को कानूनी मान्यता नहीं मिलती और मामला POCSO Act के तहत दर्ज किया जा सकता है।

‘Romeo and Juliet Clause’ पर भी हो रही चर्चा

अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने बताया कि कई देशों में ‘Romeo and Juliet Clause’ या Close-in-Age Exception का प्रावधान लागू है। इसके तहत यदि दोनों किशोर लगभग समान आयु के हों और संबंध पूरी तरह सहमति से हो, तो उन्हें गंभीर यौन अपराधी की श्रेणी में नहीं रखा जाता।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में फिलहाल ऐसा कोई कानूनी प्रावधान लागू नहीं है। इस विषय पर विधिक और नीतिगत स्तर पर चर्चा जरूर चल रही है, लेकिन किसी भी बदलाव के लिए संसद द्वारा कानून में संशोधन आवश्यक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई नया प्रावधान लागू नहीं किया है।

बच्चों की सुरक्षा से समझौता नहीं

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि POCSO Act का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है और इस उद्देश्य से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।

साथ ही उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने न्यायालय को जानकारी दी है कि कक्षा 6 से चरणबद्ध तरीके से POCSO Act और बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की योजना पर काम किया जा रहा है, ताकि बच्चों और समाज को कानून की सही जानकारी मिल सके।

कानून का उद्देश्य बना रहे प्राथमिकता

अपने बयान के अंत में अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन किसी भी कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है, जब उसका उपयोग केवल उसके वास्तविक उद्देश्य के लिए किया जाए। उन्होंने कहा कि कानून को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसके संतुलित, विवेकपूर्ण और न्यायसंगत उपयोग की आवश्यकता है।

(नोट: यह लेख अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू द्वारा जारी बयान पर आधारित है। इसमें व्यक्त कानूनी टिप्पणियां और विचार उनके निजी मत हैं।)

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