सोशल संवाद/डेस्क: अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने समुद्र में पहले से मौजूद ईरानी तेल की खरीद पर 30 दिनों के लिए अस्थायी राहत दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब 14 करोड़ बैरल तेल की सप्लाई बढ़ने की उम्मीद है।
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यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के कारण तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जो 2022 के बाद का उच्चतम स्तर माना जा रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया है कि यह छूट केवल उसी तेल पर लागू होगी जो पहले से रास्ते में है, यानी नई खरीद या उत्पादन की अनुमति इसमें शामिल नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बीते तीन हफ्तों से जारी इस संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है और आने वाले समय में कीमतों में और उतार-चढ़ाव की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जिसके चलते ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ा है। यही वजह है कि पिछले दो हफ्तों में यह तीसरी बार है जब अमेरिका ने अपने विरोधी देशों के तेल पर अस्थायी ढील दी है। इससे पहले रूसी तेल पर भी कुछ प्रतिबंधों में नरमी दिखाई गई थी।
इस फैसले से खासतौर पर एशियाई देशों को राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि ये देश ईरानी तेल के बड़े खरीदार हैं। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट के अनुसार, यह अतिरिक्त सप्लाई अगले कुछ दिनों में एशिया पहुंच सकती है और एक महीने के भीतर बाजार में रिफाइन होकर उपलब्ध हो जाएगी। हालांकि, अमेरिका ने यह भी साफ किया है कि इस छूट से होने वाली आय तक ईरान की पहुंच सीमित रखने के लिए उस पर दबाव बनाए रखा जाएगा।
वहीं, ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह से जहाजों के लिए नहीं खोला जाता, तब तक इन कदमों का असर सीमित ही रहेगा। दरअसल, दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है, और मौजूदा तनाव के कारण यह मार्ग भी प्रभावित हुआ है। ऐसे में अमेरिका की यह अस्थायी राहत कीमतों को कुछ समय के लिए जरूर काबू में ला सकती है, लेकिन स्थायी समाधान अभी भी दूर नजर आ रहा है।









