सोशल संवाद/डेस्क : भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को दिशा देने वाली संस्था यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। वर्ष 2026 में प्रस्तावित नए UGC Act को लेकर देशभर में छात्र संगठनों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों के बीच असंतोष देखने को मिल रहा है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां नए प्रावधानों की संवैधानिकता और सामाजिक प्रभाव पर सुनवाई की मांग की गई है। हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब यूजीसी के नियमों का विरोध हो रहा हो। पिछले डेढ़ दशक में यूजीसी के कई फैसले आंदोलन, प्रदर्शन और कानूनी लड़ाई की वजह बने हैं।

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UGC की स्थापना और भूमिका
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की स्थापना 28 दिसंबर 1953 को हुई थी, जबकि नवंबर 1956 में इसे वैधानिक दर्जा मिला। यूजीसी का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालयों को मान्यता देना, उच्च शिक्षा के लिए मानक तय करना, शोध को बढ़ावा देना और छात्रों के हितों की रक्षा करना है। लेकिन बदलते समय के साथ यूजीसी की नीतियां बार-बार विवादों में घिरी हैं, जिनका असर सीधे तौर पर करोड़ों छात्रों और शिक्षकों पर पड़ा है।
2009–10: डीम्ड यूनिवर्सिटी विवाद
2009 में टंडन कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर यूजीसी ने 44 डीम्ड यूनिवर्सिटीज की मान्यता रद्द करने की सिफारिश की। इस फैसले से हजारों छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया। यूनिवर्सिटीज और छात्रों ने इसका जमकर विरोध किया और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।2010 में कोर्ट ने कुछ संस्थानों को राहत दी और यूजीसी को स्पष्ट व पारदर्शी नियम बनाने के निर्देश दिए।

2013–14: दिल्ली यूनिवर्सिटी का FYUP विवाद
चार वर्षीय अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUP) को दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किया गया, लेकिन छात्रों और शिक्षकों की तैयारी के बिना लागू किए गए इस सिस्टम ने बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया। लगातार विरोध और शैक्षणिक अव्यवस्था के बाद 2014 में यूजीसी को यह योजना वापस लेनी पड़ी।
2015: CBCS सिस्टम पर विरोध
यूजीसी ने मार्किंग सिस्टम हटाकर Choice Based Credit System (CBCS) लागू किया। हालांकि छात्रों को विषय चुनने की आजादी मिली, लेकिन शिक्षकों ने इसे जल्दबाजी में लागू किया गया फैसला बताया। हड़ताल और विरोध के बावजूद यूजीसी ने CBCS को बनाए रखा, हालांकि गाइडलाइंस में कुछ बदलाव किए गए।

2016–19: जाति आधारित भेदभाव के मुद्दे
विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव तब राष्ट्रीय बहस बना जब कुछ छात्रों की आत्महत्या के मामले सामने आए। इसके बाद यूजीसी पर दबाव बढ़ा कि वह कैंपस में भेदभाव रोकने के लिए ठोस नियम बनाए। इन मामलों ने उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय की गंभीर कमी को उजागर किया।
2018: ग्रेडेड ऑटोनॉमी विवाद
यूजीसी ने कई विश्वविद्यालयों को ग्रेडेड ऑटोनॉमी दी, जिससे उन्हें फीस और कोर्स तय करने की आजादी मिली। छात्रों और शिक्षकों को डर था कि इससे शिक्षा महंगी हो जाएगी। विरोध संसद तक पहुंचा, लेकिन यूजीसी ने निगरानी बढ़ाने का आश्वासन देकर फैसला कायम रखा।
2020: कोविड और फाइनल ईयर परीक्षा
कोविड-19 महामारी के दौरान यूजीसी ने फाइनल ईयर परीक्षा कराने का आदेश दिया। छात्रों ने इसे असुरक्षित बताया और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने यूजीसी के अधिकार को सही ठहराया, लेकिन राज्यों को विकल्प देने की छूट दी गई।

2023–25: आरक्षण, NET और रिसर्च विवाद
2023 में आरक्षण पदों की डी-रिजर्वेशन नीति का कड़ा विरोध हुआ, जिसके बाद यूजीसी को ड्राफ्ट वापस लेना पड़ा।
2024 में NET परीक्षा लीक होने से भरोसा हिला, और 2025 में रिसर्च जर्नल लिस्ट हटाने पर शिक्षकों ने नाराजगी जताई।
UGC Act 2026: नया विवाद क्यों?
UGC Act 2026 को लेकर आरोप है कि इसमें कुछ परिभाषाएं गैर-समावेशी हैं और इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई की मांग की गई है।
यूजीसी भारत की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन उसके फैसलों को लेकर बार-बार उठते सवाल यह दिखाते हैं कि सुधार और संवाद दोनों जरूरी हैं। UGC Act 2026 पर चल रही बहस यह तय करेगी कि भविष्य की उच्च शिक्षा किस दिशा में जाएगी।










