सोशल संवाद / डेस्क : देश में पहले पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के तनाव के कारण तेल, गैस और उर्वरकों (खाद) की आपूर्ति प्रभावित हुई। अब भारत के सामने एक नई चुनौती कमजोर मानसून के रूप में खड़ी हो गई है। जून महीने में सामान्य से 42% कम बारिश होने के कारण खरीफ फसलों की बुवाई पर बड़ा असर पड़ा है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, देश के 111 जिलों में फसलों के सबसे अधिक प्रभावित होने की आशंका है, जबकि कुल 315 जिलों को कम बारिश से प्रभावित श्रेणी में रखा गया है।
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खरीफ फसलों की बुवाई में 23% की गिरावट
कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 25 जून तक देश में खरीफ फसलों की बुवाई 182.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 236.46 लाख हेक्टेयर था। यानी इस साल खरीफ फसलों की बुवाई में 53.74 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई, जो पिछले साल की तुलना में करीब 23 प्रतिशत कम है।
खरीफ सीजन में मुख्य रूप से धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर, उड़द, मूंग, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, कपास और जूट जैसी फसलों की खेती की जाती है।
111 जिलों में सबसे अधिक खतरा
कृषि मंत्रालय ने देशभर के 315 जिलों की पहचान की है, जहां कमजोर मानसून का असर देखने को मिल सकता है। इनमें 111 जिलों को सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। सबसे अधिक प्रभावित जिलों में महाराष्ट्र के 20 और छत्तीसगढ़ के 10 जिले शामिल हैं। इन क्षेत्रों में केवल लगभग 25 प्रतिशत कृषि भूमि सिंचाई सुविधाओं से जुड़ी है, जबकि शेष 75 प्रतिशत खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर है।
महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में सूखे जैसे हालात
कम बारिश का सबसे अधिक असर पश्चिम भारत में देखने को मिल रहा है।
- महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के लगभग 71% क्षेत्र सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं।
- मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 53% इलाके भी कम बारिश से प्रभावित हैं।
- वहीं पूर्वोत्तर के राज्यों—अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम—के 62% क्षेत्रों में भी सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है।
76 जिले मीडियम और 128 जिले लो-प्रायोरिटी श्रेणी में
कृषि मंत्रालय के अनुसार, प्रभावित 315 जिलों में:
- 111 जिले हाई प्रायोरिटी श्रेणी में हैं।
- 76 जिले मीडियम प्रायोरिटी में रखे गए हैं, जहां 20 से 50 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है।
- 128 जिले लो प्रायोरिटी में हैं, जहां नहरों और अन्य सिंचाई साधनों के कारण फसलों पर कम बारिश का असर अपेक्षाकृत कम पड़ने की संभावना है।
100 वर्षों में तीसरी बार इतना सूखा जून
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार अल-नीनो के प्रभाव ने दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर कर दिया है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार जून में सामान्य रूप से 157.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन इस वर्ष केवल 92.2 मिमी वर्षा दर्ज की गई। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले 100 वर्षों में यह तीसरी बार है जब जून का महीना इतना सूखा रहा।
तिलहन और कपास की बुवाई सबसे ज्यादा प्रभावित
कम बारिश का सबसे अधिक असर तिलहन फसलों पर पड़ा है।
- तिलहन का रकबा 36.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गया।
- कपास की बुवाई 45.36 लाख हेक्टेयर से घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गई।
- मोटे अनाज का रकबा भी 36.07 लाख हेक्टेयर से घटकर 31.84 लाख हेक्टेयर रह गया।
- धान और दलहन की बुवाई में भी गिरावट दर्ज की गई है।
क्या बढ़ सकती है महंगाई?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो फसलों की पैदावार प्रभावित होगी। इसका असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
जुलाई में राहत की उम्मीद
हालांकि भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने राहत की संभावना जताई है। विभाग के अनुसार जुलाई के शुरुआती दिनों में देश के कई हिस्सों, विशेषकर मध्य भारत में अच्छी बारिश होने की संभावना है। यदि अनुमान सही साबित होता है तो खरीफ फसलों की स्थिति में सुधार आ सकता है और किसानों को राहत मिलेगी।










