सोशल संवाद / रांची: रांची के नगड़ी क्षेत्र में प्रस्तावित रिम्स-2 परियोजना को लेकर भूमि अधिग्रहण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है। इस मामले को लेकर आदिवासी एवं मूलवासी संगठनों के साथ-साथ कई जनप्रतिनिधियों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए भूमि अधिकारों और विस्थापन के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है।
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बिना अधिग्रहण जमीन लेने का आरोप
विरोध जताने वाले पक्षों का आरोप है कि नगड़ी क्षेत्र में आदिवासियों और मूलवासियों की जमीन को बिना स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया पूरी किए रिम्स-2 परियोजना के लिए लेने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि रांची शहर का बड़ा हिस्सा पहले से ही आदिवासी एवं मूलवासी समुदायों की जमीन पर विकसित हुआ है, लेकिन भूमि देने वाले कई परिवारों को आज तक समुचित पुनर्वास और लाभ नहीं मिल सका।
पुराने अधिग्रहण पर उठे सवाल
विरोध करने वालों का कहना है कि सरकार जिस 1957-58 के भूमि अधिग्रहण का हवाला दे रही है, वह प्रक्रिया पूरी तरह संपन्न नहीं हुई थी। उनका दावा है कि उस समय स्थानीय विरोध के बाद अधिग्रहण की प्रक्रिया रोक दी गई थी और कई किसान वर्षों तक संबंधित भूमि की मालगुजारी भी जमा करते रहे।
साथ ही यह तर्क भी दिया जा रहा है कि भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार यदि प्रभावित लोगों को मुआवजा नहीं मिला हो या भूमि पर सरकार का वास्तविक कब्जा न हो, तो ऐसे मामलों में अधिग्रहण की वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
वैकल्पिक जमीन पर अस्पताल बनाने की मांग
विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि रांची और आसपास के क्षेत्रों में अन्य सरकारी भूमि उपलब्ध है। उनका सुझाव है कि रिम्स-2 जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य परियोजना के लिए वैकल्पिक भूमि का उपयोग किया जाए, ताकि किसानों और स्थानीय रैयतों की जमीन प्रभावित न हो।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी उठाए गए प्रश्न
भूमि विवाद के साथ-साथ राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। वक्ताओं का कहना है कि कई सरकारी अस्पतालों में अब भी डॉक्टरों, दवाइयों, जांच सुविधाओं और अन्य संसाधनों की कमी बनी हुई है। उनका तर्क है कि केवल नई इमारतें बनाने के बजाय मौजूदा स्वास्थ्य संस्थानों की व्यवस्था को मजबूत करने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
पांचवीं अनुसूची और सीएनटी एक्ट का मुद्दा
नगड़ी क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है और यहां आदिवासी भूमि संरक्षण से जुड़े विभिन्न कानून लागू हैं। विरोध करने वाले पक्षों का कहना है कि विकास परियोजनाओं को लागू करते समय स्थानीय समुदायों के अधिकारों, ग्रामसभा की भूमिका और कानूनी प्रावधानों का पूर्ण सम्मान किया जाना चाहिए।
आंदोलन तेज करने की चेतावनी
भूमि अधिकारों की मांग कर रहे संगठनों ने संकेत दिया है कि यदि उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हुआ तो राज्यभर के आदिवासी और मूलवासी समुदायों की भागीदारी के साथ बड़े स्तर पर आंदोलन आयोजित किया जा सकता है। उनका कहना है कि वे अपनी जमीन और अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेंगे।
संवाद और समाधान की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास परियोजनाओं और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। ऐसे मामलों में सरकार, प्रशासन, ग्रामसभा और प्रभावित लोगों के बीच संवाद स्थापित कर पारदर्शी समाधान निकालना ही सबसे बेहतर रास्ता हो सकता है।









