सोशल संवाद / डेस्क : झारखंड गठन के 26 वर्षों में राज्य की पेयजल व्यवस्था में काफी बदलाव आया है। साल 2000 में जहां बड़ी आबादी नदी, तालाब और कुओं जैसे असुरक्षित जलस्रोतों पर निर्भर थी, वहीं साल 2026 तक करीब 35 लाख घरों में पाइपलाइन के जरिए पेयजल पहुंचाया जा रहा है। राज्य सरकार ने अगले दो वर्षों में 65 लाख घरों तक पाइप से पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
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2000 से 2026 तक पेयजल व्यवस्था में कितना बदलाव?
झारखंड गठन के समय करीब 1.22 करोड़ लोगों को पीने के पानी के लिए असुरक्षित जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब जल जीवन मिशन और राज्य सरकार की योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में घरों तक पाइप कनेक्शन पहुंचाए जा रहे हैं। इसके अलावा दो करोड़ से अधिक लोग सामुदायिक जलापूर्ति योजनाओं से पेयजल प्राप्त कर रहे हैं।
हालांकि, नल से जल उपलब्ध कराने के मामले में झारखंड अभी राष्ट्रीय औसत से पीछे है। राज्य में फिलहाल 55.89 प्रतिशत घरों तक ही नल से जल पहुंचा है, जबकि राष्ट्रीय औसत 82.47 प्रतिशत बताया गया है।
अशुद्ध पानी से होने वाली बीमारियों में 75% तक कमी का दावा
सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता बढ़ने से लोगों के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ा है। गहन चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. ऋषिकेश झा के अनुसार, अशुद्ध पेयजल पीने से होने वाली बीमारियों के मामलों में करीब 75 प्रतिशत तक कमी आई है। बरसात के बाद भी दूषित पानी से होने वाली बीमारियों में गिरावट देखी गई है।
वर्षा जल संचयन पर जोर, 7 हजार नए तालाब बने
झारखंड की पहाड़ी और पठारी भौगोलिक संरचना के कारण बारिश का करीब 74 प्रतिशत पानी बहकर बाहर चला जाता है। साल 2000 में राज्य कुल वर्षा जल का लगभग छह प्रतिशत ही संरक्षित कर पाता था। पिछले दस वर्षों में करीब 7,000 नए तालाब बनाए गए हैं। इसके अलावा चेकडैम का भी निर्माण कराया गया है।
सरकार अगले पांच वर्षों में कुल बारिश के 40 प्रतिशत पानी को संरक्षित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी के मुताबिक, आवासीय क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन को लेकर विशेष अभियान चलाने की जरूरत है। इससे भूजल स्तर में सुधार होगा और कृषि क्षेत्र को भी लाभ मिलेगा।
सोन नदी जल बंटवारे पर बिहार-झारखंड में समझौता
झारखंड और बिहार के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद की स्थिति बनी हुई थी। वर्ष 2026 में दोनों राज्यों के बीच इस मुद्दे पर समझौता होने की जानकारी दी गई है। इसके तहत झारखंड को 2 मिलियन एकड़ फीट पानी मिलने की बात कही गई है। इससे पलामू प्रमंडल के जिलों में जल उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है।
झारखंड के 30% क्षेत्र में फ्लोराइड, आर्सेनिक और आयरन की समस्या
राज्य के करीब 30 प्रतिशत क्षेत्र में फ्लोराइड, आर्सेनिक और आयरन मिश्रित पानी की समस्या बताई गई है। इससे निपटने के लिए जल जांच प्रयोगशालाओं की व्यवस्था की गई है। जल सहियाओं को पानी की जांच के लिए किट भी उपलब्ध कराई गई हैं।
इसके अलावा एनएबीएल से मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में निर्धारित शुल्क देकर पानी में मौजूद हानिकारक तत्वों और बैक्टीरिया की जांच कराई जा सकती है। सरकार का लक्ष्य अगले दो वर्षों में सभी जिलों की जल जांच प्रयोगशालाओं को अपग्रेड कर आधुनिक बनाना है।
29,756 जल सहिया संभाल रहीं जलस्रोतों की जिम्मेदारी
झारखंड में जलस्रोतों के रखरखाव और स्वच्छता के लिए 29,756 जल सहिया काम कर रही हैं। इन्हें तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि वे हैंडपंप और सोलर वाटर सिस्टम जैसे जलस्रोतों की देखरेख और मरम्मत कर सकें। जल सहिया हर घर जल अभियान के तहत सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने और जलापूर्ति योजनाओं के लिए शुल्क संग्रह में भी भूमिका निभा रही हैं। गांवों में जलस्रोतों के आसपास साफ-सफाई बनाए रखने में भी इनका योगदान है।
ग्रामीण इलाकों में सिंगल विलेज सिस्टम से पहुंचेगा पानी
ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर पेयजल पहुंचाने के लिए सिंगल विलेज सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस व्यवस्था में गांव के किसी जलस्रोत के पास पंपिंग स्टेशन बनाया जाता है। इसके बाद छोटे ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए पानी को शुद्ध कर घरों तक पहुंचाया जाता है।
इस सिस्टम में बिजली की जरूरत कम करने के लिए सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है। गांवों के आसपास मौजूद झरने, नदी और तालाब जैसे जलस्रोतों के आधार पर इसे स्थापित किया जा सकता है।
अगले दो वर्षों में 65 लाख घरों तक पाइप से पानी पहुंचाने का लक्ष्य
पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने कहा है कि राज्य सरकार की प्राथमिकता प्रत्येक घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाना है। जल जीवन मिशन और राज्य सरकार की अन्य योजनाओं की लगातार निगरानी की जा रही है। साथ ही जल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए जांच प्रयोगशालाओं को आधुनिक बनाया जा रहा है।
सरकार ने अगले दो वर्षों में 65 लाख घरों तक पाइपलाइन के जरिए पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन में सरकार और आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
झारखंड में पेयजल व्यवस्था का सफर: 26 वर्षों में जलापूर्ति के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने, दूषित जल की समस्या दूर करने और वर्षा जल का अधिकतम संचयन करने की चुनौती अभी बाकी है।











