सोशल संवाद/डेस्क: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुयन ने भारत में असहमति की अभिव्यक्ति और विरोध प्रदर्शनों को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग विचारों और असहमति के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। उनका कहना था कि कई बार अपने अधिकारों की मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें आसानी से जमानत भी नहीं मिलती।
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छात्रों की गिरफ्तारी और जमानत पर जताई चिंता
जस्टिस उज्जल भुयन ने कहा कि कई मामलों में प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। यदि उन्हें जमानत मिल भी जाती है, तो कई बार ऐसी शर्तें लगाई जाती हैं, जो उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को काफी हद तक सीमित कर देती हैं। उन्होंने इस प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे लोकतांत्रिक अधिकारों पर असर पड़ता है।
‘असहमति जताने के वैध तरीकों को भी अपराध बनाया जा रहा’
अपने संबोधन में जस्टिस भुयन ने कहा कि आज के समय में वैध और शांतिपूर्ण तरीके से असहमति जताने को भी कई बार अपराध की तरह देखा जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जमानत देने के बाद अत्यधिक प्रतिबंधात्मक शर्तें लगाने का चलन बढ़ रहा है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
गंगा में इफ्तार पार्टी वाले मामले का भी किया उल्लेख
जस्टिस भुयन ने गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार करने वाले युवाओं के मामले का जिक्र करते हुए भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में जमानत नहीं दिए जाने या अनावश्यक सख्त शर्तें लगाए जाने पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।
सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस
जस्टिस उज्जल भुयन की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। कई लोगों ने इसे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर न्यायपालिका की चिंता के रूप में देखा है। वहीं, विभिन्न वर्गों की ओर से इस बयान पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।









