सोशल संवाद / डेस्क : देश के सरकारी स्कूलों में चल रही पीएम पोषण (मिड-डे मील) योजना को लेकर एक नई रिपोर्ट ने बच्चों के पोषण संबंधी इंतजामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले एक दशक में स्कूलों में अंडे और फलों की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे करोड़ों बच्चों के संतुलित पोषण पर असर पड़ सकता है।
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स्कूलों में कम हुए अंडे
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में केवल 13 राज्यों ने पीएम पोषण योजना के तहत स्कूली बच्चों को अंडे उपलब्ध कराए। जबकि 2015-16 में यह संख्या 16 राज्यों की थी। यानी अब केवल लगभग एक-तिहाई राज्य ही बच्चों को अंडे उपलब्ध करा रहे हैं।
पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि अंडा बच्चों के लिए प्रोटीन का सबसे सस्ता और प्रभावी स्रोत माना जाता है। इसके बावजूद कई राज्यों में वैचारिक और नीतिगत कारणों से इसे भोजन से बाहर रखा जा रहा है।
फलों की उपलब्धता में भी आई भारी गिरावट
केवल अंडे ही नहीं, बल्कि स्कूली भोजन में फलों की उपलब्धता भी तेजी से घटी है। एक दशक पहले जहां लगभग एक-तिहाई राज्यों में बच्चों को फल दिए जाते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर एक-पांचवें से भी कम रह गई है। इससे बच्चों को आवश्यक विटामिन, मिनरल्स और सूक्ष्म पोषक तत्व मिलने में कमी आने की आशंका जताई जा रही है।
पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील को लेकर नया विवाद
इसी बीच पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा कोलकाता नगर निगम के अंतर्गत आने वाले स्कूलों में पका हुआ मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी इस्कॉन को सौंपने के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है।
मेन्यू को लेकर उठे विवाद के बीच इस्कॉन कोलकाता के उपाध्यक्ष राधारमन दास ने स्पष्ट किया है कि अभी तक भोजन सूची को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। हालांकि इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच भी बयानबाजी तेज हो गई है।
कई राज्यों में पहले भी हो चुका है विवाद
स्कूलों में अंडा परोसने का मुद्दा पहले भी कई राज्यों में विवाद का कारण बन चुका है। कर्नाटक और लक्षद्वीप जैसे राज्यों में इस विषय पर राजनीतिक और वैचारिक मतभेद सामने आए थे। हालांकि स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञ लगातार यह कहते रहे हैं कि बढ़ते बच्चों के लिए अंडा उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का सुलभ और किफायती स्रोत है।
संसद की समिति ने भी जताई चिंता
संसदीय स्थायी समिति ने भी हाल ही में पीएम पोषण योजना के क्रियान्वयन पर चिंता व्यक्त की है। समिति ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में पिछले दो वर्षों के दौरान योजना के प्रभावी संचालन पर सवाल उठाए हैं। समिति का मानना है कि योजना का उद्देश्य केवल बच्चों का पेट भरना नहीं, बल्कि उन्हें संतुलित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना भी है।
विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्कूलों के भोजन में अंडे, फल और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता लगातार घटती रही, तो इसका सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों पर पड़ेगा, क्योंकि इनमें से बड़ी संख्या अपने दैनिक पोषण के लिए स्कूल के भोजन पर निर्भर रहती है।










