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  • हैदराबाद के 84% IT प्रोफेशनल्स फैटी लिवर के शिकार, जानिए क्यों और कैसे बचें

    हैदराबाद के 84% IT प्रोफेशनल्स फैटी लिवर के शिकार, जानिए क्यों और कैसे बचें

    सोशल संवाद /डेस्क : आधुनिक जीवनशैली और तकनीक आधारित नौकरियाँ जितनी आरामदायक लगती हैं, उनके पीछे छिपे स्वास्थ्य खतरे उतने ही गंभीर हैं। हैदराबाद में हुए एक हालिया शोध ने इस खतरे की घंटी बजा दी है—84% IT प्रोफेशनल्स फैटी लिवर की समस्या से जूझ रहे हैं। यह आंकड़ा Nature Scientific Reports Journal में प्रकाशित हुआ और अब सबको सोचने पर मजबूर कर रहा है।

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    फैटी लिवर क्या होता है?

    जब लिवर में वसा (चर्बी) का असामान्य रूप से जमाव होता है, तो उसे फैटी लिवर कहा जाता है। यह लिवर को कमजोर कर देता है और समय पर इलाज न मिले तो यह सिरोसिस या लिवर कैंसर में भी बदल सकता है।

    IT सेक्टर में फैटी लिवर के 3 बड़े कारण

    1.फास्ट फूड और पैकेज्ड फूड का ज़्यादा सेवन
    देर रात काम करने वाले कर्मचारियों के लिए जंक फूड आम है, जो लिवर पर सीधा असर डालता है।

    2.बैठे रहने वाली जीवनशैली
    घंटों कुर्सी पर बैठना चर्बी को लिवर में जमा करता है।

    3.तनाव, नींद की कमी और नशा
    ये तीनों मिलकर लिवर को चुपचाप नुकसान पहुँचाते हैं।

    फैटी लिवर के लक्षण पहचानें

    बिना मेहनत के थकान

    पेट में भारीपन

    भूख में कमी

    बिना वजह वजन घटाना

    आंखों या त्वचा का पीला होना

    पैरों में सूजन

    त्वचा में खुजली

    अगर ये लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

    कैसे करें बचाव?

    स्वस्थ भोजन अपनाएं: फल, हरी सब्ज़ियाँ, दालें, कम तेल वाला खाना

    दैनिक 30 मिनट की एक्टिविटी: टहलना, योग या हल्का व्यायाम

    तले-भुने और मीठे पेय पदार्थों से दूरी

    वजन को नियंत्रित रखें

    भरपूर पानी पिएँ और 7-8 घंटे की नींद लें

    सिर्फ कोडिंग से नहीं, हेल्थ से भी करें खुद को अपग्रेड!
    अब समय है अपनी डेस्क जॉब से बाहर निकलकर अपने शरीर और लिवर की देखभाल करने का।
    आज से ही शुरू करें!

  • बेलपत्र के फायदे, आस्था ही नहीं, सेहत का खज़ाना है ये पत्ता

    बेलपत्र के फायदे, आस्था ही नहीं, सेहत का खज़ाना है ये पत्ता

    सोशल संवाद /डेस्क : बेलपत्र को हम अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों में भगवान शिव को चढ़ाते हुए देखते हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार, इसका उपयोग सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं है। यह पत्ता औषधीय गुणों से भरपूर होता है और कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में रामबाण की तरह काम करता है। खासतौर पर सुबह खाली पेट बेलपत्र का सेवन करने से शरीर में अद्भुत बदलाव देखे जा सकते हैं। आइए जानते हैं इसके चमत्कारी फायदों के बारे में

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    1. पाचन शक्ति को करे मजबूत

    बेलपत्र में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है। कब्ज, गैस, एसिडिटी और पेट दर्द जैसी समस्याएं धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। यह आंतों की सफाई कर उन्हें स्वस्थ बनाए रखता है।

    2. शरीर में ठंडक बनाए रखे

    बेलपत्र की तासीर ठंडी होती है। गर्मियों में इसका सेवन शरीर को अंदर से ठंडा रखता है और मुंह के छालों में भी राहत देता है।

    3. डायबिटीज पर नियंत्रण

    बेलपत्र ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करता है। खाली पेट चबाने से इंसुलिन उत्पादन में सुधार होता है और शुगर लेवल स्थिर रहता है।

    4. तनाव कम करता है

    इसमें मौजूद एंटी-स्ट्रेस तत्व मानसिक शांति प्रदान करते हैं। यह ध्यान केंद्रित करने और तनाव दूर करने में मददगार है।

    5. त्वचा को बनाए चमकदार

    इसके एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण मुंहासे, दाग-धब्बे और एलर्जी जैसी समस्याओं से राहत देते हैं। इससे चेहरा साफ और ग्लोइंग बनता है।

    बेलपत्र खाने का सही तरीका

    सुबह उठकर 3-4 ताजे बेलपत्र अच्छी तरह धोकर चबाएं।इसके बाद गुनगुना पानी पी लें।अधिक मात्रा में सेवन न करें—वरना पेट में जलन हो सकती है।यदि आप किसी दवा पर हैं या गंभीर रोग से पीड़ित हैं, तो पहले डॉक्टर से परामर्श ज़रूर लें।

    ध्यान रखें: बेलपत्र का सेवन धार्मिक आस्था के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी शरीर को अनेक फायदे पहुंचा सकता है। बस नियमितता और संतुलन बनाए रखना जरूरी है।अगर चाहें, तो मैं इसी विषय पर एक सोशल मीडिया रील स्क्रिप्ट या इन्फोग्राफिक डिज़ाइन आइडिया भी बना सकती हूँ।

  • लाइम रोग क्या होता है, इसके लक्षण और इसका उपचार क्या है आइये जानते है

    लाइम रोग क्या होता है, इसके लक्षण और इसका उपचार क्या है आइये जानते है

    सोशल संवाद /डेस्क : लाइम रोग बोरेलिया बर्गडॉर्फेरी नामक कीड़े के काटने से होता है। ये कीड़े इतने छोटे होते हैं कि इन्हें देखना मुश्किल होता है। संक्रमित कीड़े के काटने के बाद, मनुष्यों में 3 से 30 दिनों के भीतर लाइम रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में, हर साल लाइम रोग के लगभग 30,000 मामले अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (सीडीसी) को रिपोर्ट किए जाते हैं।

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    लेकिन कुछ ऐसे मामले भी हैं जिनका निदान हो चुका है और जिनकी रिपोर्ट नहीं की जाती। आइए एक नज़र में लाइम रोग के लक्षणों के बारे में जानें-

    1. लाइम रोग के लक्षण आमतौर पर फ्लू जैसे होते हैं।
    2. लाइम रोग होने पर त्वचा पर मच्छर के काटने जैसे निशान दिखाई देते हैं। यह निशान लाल बिंदु जैसा होता है, जो धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है।
    3. त्वचा पर ये लाल धब्बे धीरे-धीरे बड़े होते जाते हैं और इनमें खुजली नहीं होती।
    4. बुखार भी लाइम रोग का एक लक्षण हो सकता है।
    5. ठंड लगना।
    6. धीमी नाड़ी।
    7. सिरदर्द की लगातार समस्या।
    8. थकान महसूस होना।
    9. मांसपेशियों में दर्द।
    10. लिम्फ नोड्स का बढ़ना।

    डॉक्टर के पास कब जाएँ

    लाल धब्बे होने का मतलब यह नहीं है कि आपको लाइम रोग है। अगर आपको लाल धब्बों के साथ ऊपर बताए गए लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लें।

    लाइम रोग किसे हो सकता है (लाइम रोग के जोखिम कारक)

    लाइम रोग आमतौर पर 5 से 14 साल के बच्चों और 40 से 50 साल के वयस्कों में होता है। लाइम रोग का सबसे बड़ा जोखिम कारक उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रहना है जहाँ टिक्स के संपर्क में आना आसान है – जैसे कि न्यू इंग्लैंड राज्य, साथ ही मिनेसोटा और विस्कॉन्सिन। लाइम रोग के अन्य जोखिम कारकों में जंगल या खेतों में बागवानी जैसी बाहरी गतिविधियाँ शामिल हैं, जिनसे लाइम रोग का खतरा बढ़ जाता है।

    लाइम रोग: उपचार

    लाइम रोग का उपचार डॉक्टर की देखरेख में किया जाता है। रोग के शुरुआती चरणों में, डॉक्टर एंटीबायोटिक्स लिख सकते हैं। लाइम रोग के लिए दी जाने वाली सामान्य एंटीबायोटिक्स में डॉक्सीसाइक्लिन, एमोक्सिसिलिन और सेफुरॉक्साइम शामिल हैं। संक्रमित ब्लैकलेग्ड टिक्स का उपयोग लाइम रोग के निदान के लिए भी किया जा सकता है।

    लाइम रोग से पीड़ित व्यक्ति के लिए क्या संभावनाएं हैं?

    लाइम रोग से पीड़ित और समय पर इलाज कराने वाले ज़्यादातर लोग ठीक हो जाते हैं। इलाज से लाइम रोग ठीक हो सकता है, लेकिन फिर भी इसके कुछ दीर्घकालिक प्रभाव हो सकते हैं। लाइम रोग का इलाज न कराने पर अन्य गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं, लेकिन यह शायद ही कभी जानलेवा होता है।

  • फेफड़ों के कैंसर का समय पर पता लगाना ज़रूरी, जानें लक्षण, जांच और उपचार के चरण

    फेफड़ों के कैंसर का समय पर पता लगाना ज़रूरी, जानें लक्षण, जांच और उपचार के चरण

    सोशल संवाद / डेस्क : कैंसर का नाम आते ही मन में डर और चिंता दोनों एक साथ आ जाते हैं। खासकर फेफड़ों का कैंसर, जो न केवल तेज़ी से बढ़ता है, बल्कि शुरुआती लक्षणों को अक्सर नज़रअंदाज़ भी कर दिया जाता है। धूम्रपान करने वालों में यह बीमारी आम हो गई है, लेकिन अब धूम्रपान न करने वाले भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

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    फेफड़ों के कैंसर का निदान कैसे किया जाता है?

    फेफड़ों के कैंसर का शुरुआती पता लगाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसके लक्षण सामान्य सर्दी-ज़ुकाम, खांसी या सांस लेने में तकलीफ जैसे लगते हैं। लेकिन अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। जाँच की प्रक्रिया इस प्रकार है।

    • छाती का एक्स-रे-: फेफड़ों की असामान्य संरचना की जाँच के लिए एक सामान्य पहला कदम।
    • सीटी स्कैन : फेफड़ों की बारीकी से जाँच करने के लिए विस्तृत चित्र प्रदान करता है।
    • थूक परीक्षण : कैंसर कोशिकाओं का पता लगाने के लिए बलगम का प्रयोगशाला विश्लेषण।
    • बायोप्सी : संदेहास्पद क्षेत्रों से नमूने लेकर कैंसर की जाँच की जाती है।
    • पीईटी स्कैन / ब्रोंकोस्कोपी : कैंसर के चरण और प्रसार का पता लगाने के लिए उन्नत तरीके।

    किस चरण तक मरीज़ की जान बचाई जा सकती है?

    चरण 1: कैंसर केवल फेफड़ों तक ही सीमित होता है। इस चरण में पता चलने पर, उपचार के माध्यम से रोगी के बचने की संभावना 70-80 प्रतिशत तक होती है।

    चरण 2: कैंसर आस-पास की लिम्फ नोड्स तक फैल चुका होता है, लेकिन उपचार संभव है। ठीक होने की दर लगभग 50 प्रतिशत होती है।

    चरण 3: कैंसर छाती के अन्य भागों में फैल चुका होता है। उपचार अधिक कठिन हो जाता है, लेकिन कभी-कभी कीमोथेरेपी और विकिरण से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

    चरण 4: यह अंतिम चरण है जहाँ कैंसर शरीर के अन्य भागों में फैल चुका होता है। इस चरण में, उपचार से जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है, लेकिन पूरी तरह से ठीक होना मुश्किल होता है।

  • जंक फ़ूड खाना चाह कर भी नहीं छोड़ पा रहे तो अपनाएँ यह उपाय

    जंक फ़ूड खाना चाह कर भी नहीं छोड़ पा रहे तो अपनाएँ यह उपाय

    सोशल संवाद /डेस्क : खाना चाहे कितना भी हेल्दी क्यों न हो, जंक फ़ूड देखते ही हमारा मन भटकने लगता है। भले ही हम पेट भर खा लें, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं की जंक फ़ूड देखते ही झपट्टा मार देते है। इतना ही नहीं, कुछ लोग एसे भी होते है हफ़्ते में कम से कम चार से पाँच दिन बर्गर, फ्राइड राइस आदि खाने से खुद को रोक नहीं पाते। वहीं, कुछ लोग जंक फ़ूड खाने से बचने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी क्रेविंग कंट्रोल नहीं हो पाती। यह एक आम समस्या है, जिसका कारण शारीरिक और मानसिक दोनों हो सकते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि कौन से तरीके आपको जंक फ़ूड खाने से बचने में मदद कर सकते हैं।

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    खूब पानी पिएं

    पर्याप्त पानी पीने से भूख नियंत्रित रहती है और डिहाइड्रेशन से बचाव होता है। इसलिए भोजन के बीच स्नैक्स, कॉफ़ी और चाय से बचें। इसके साथ ही, आपको पोषक तत्वों से भरपूर स्वस्थ खाद्य पदार्थों का सेवन कम मात्रा में, बार-बार करना चाहिए। इससे आपको जंक फ़ूड खाने से बचने में मदद मिल सकती है।

    भोजन को अच्छी तरह चबाकर निगलें

    पोषण विशेषज्ञ कहते हैं कि भोजन को अच्छी तरह चबाने से आपकी भूख कम हो सकती है। जल्दी-जल्दी खाने से भूख और स्नैक्स जैसे अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की लालसा आसानी से बढ़ सकती है। इसलिए, आपको अपने भोजन को अच्छी तरह चबाकर निगलना चाहिए।

    भोजन न छोड़ें

    आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, बहुत से लोग अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण खाना भूल जाते हैं। जब उन्हें भूख लगती है, तो वे जो भी मिलता है, खा लेते हैं। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि यह अच्छी आदत नहीं है। सही समय पर खाना खाने की सलाह दी जाती है, इससे जंक फ़ूड से बचने में मदद मिलती है।

    प्रोटीन

    कार्बोहाइड्रेट की तुलना में प्रोटीन को पचने में ज़्यादा समय लगता है, इसलिए आपको बार-बार भूख नहीं लगती। इसलिए, दूध, डेयरी उत्पाद, मेवे और अंडे जैसे प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने से आपको लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होगा। इससे आपको अनावश्यक खाने की लालसा से बचने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही, पर्याप्त नींद लेने, ध्यान, योग और तनाव कम करने वाले अन्य व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। इससे स्नैकिंग की इच्छा को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। यह मन को जंक फ़ूड की ओर भटकने से रोकता है।

  • इंस्टाग्राम लुक के लिए बोटॉक्स न बन जाए पछतावा, कहीं खूबसूरती ले न ले आपकी जान

    इंस्टाग्राम लुक के लिए बोटॉक्स न बन जाए पछतावा, कहीं खूबसूरती ले न ले आपकी जान

    सोशल संवाद / डेस्क: चेहरे की झुर्रियाँ अब उम्र की पहचान नहीं, बल्कि “गुनाह” मानी जाने लगी हैं। इंस्टाग्राम की फिल्टर्ड दुनिया और सोशल मीडिया पर ‘फ्लॉलेस लुक’ का दबाव इतना बढ़ चुका है कि 20 से 30 की उम्र के नौजवान भी बोटॉक्स और फिलर्स की लाइन में लग चुके हैं।
    लेकिन सवाल उठता है — क्या ये सौंदर्य के नाम पर चल रही दौड़ शरीर को भीतर से खोखला तो नहीं कर रही?

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    ‘इलाज से पहले बचाव’ या ‘खुद से ग़द्दारी’?

    जहां पहले एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट्स को सिर्फ 40+ उम्र के लिए माना जाता था, वहीं आज ब्यूटी ट्रेंड्स ने युवाओं को भी इसकी गिरफ्त में ले लिया है। बोटॉक्स, डर्मल फिलर्स और स्किन बूस्टर्स – ये नाम अब सिर्फ हाई-प्रोफाइल सेलेब्रिटी ट्रीटमेंट नहीं रहे, बल्कि छोटे शहरों के पार्लर तक पहुंच चुके हैं।

    ये फैशन नहीं, चिकित्सा है

    “खूबसूरत दिखना गलत नहीं, लेकिन इसके लिए उठाए गए कदम बेहद चिंताजनक हैं। ये कोई ब्यूटी ट्रेंड नहीं, बल्कि मेडिकल ट्रीटमेंट है, जिसमें सटीक ज्ञान और अनुभव की जरूरत होती है।”डॉक्टर के अनुसार, बोटॉक्स, जो मांसपेशियों को अस्थायी रूप से रिलैक्स करता है, डर्मल फिलर्स, जो त्वचा को भरा-भरा दिखाते हैं, और स्किन बूस्टर्स/पीआरपी, जो त्वचा की गुणवत्ता सुधारते हैं — सभी प्रक्रियाएं गहन चिकित्सकीय निगरानी की मांग करती हैं।

    ख़ूबसूरती की कीमत बन सकती है जानलेवा

    डॉ. नेहा ने यह भी बताया कि छोटे शहरों में अनट्रेंड स्टाफ और लाइसेंसविहीन क्लीनिक बोटॉक्स-फिलर्स जैसे इंजेक्शन लगा रहे हैं। कुछ लोग यूट्यूब देखकर “डॉक्टर” बन जाते हैं और रील्स देखकर युवा बिना सोचे समझे इन प्रक्रियाओं की ओर दौड़ पड़ते हैं।गलत इंजेक्शन से लकवा, ब्रेन स्ट्रोक या त्वचा को स्थायी नुकसान तक हो सकता है,

    भारत में क्या है नियमन?

    भारतीय चिकित्सा परिषद (NMC) और CDSCO जैसी एजेंसियाँ कहती हैं:

    केवल पंजीकृत MD डॉक्टर या प्लास्टिक सर्जन ही ये उपचार कर सकते हैं।

    लाइसेंसविहीन क्लीनिक अवैध हैं।

    उपयोग की जा रही दवा, ब्रांड और खुराक का स्पष्ट रिकॉर्ड अनिवार्य है।

    ग्राहक की सहमति और उचित दस्तावेज़ ज़रूरी हैं।

    18 की उम्र में बोटॉक्स

    डॉक्टर कहते हैं, “18 से 25 की उम्र में शरीर खुद बायोलॉजिकल कोलेजन बनाता है। इस उम्र में बोटॉक्स लेना न केवल अनावश्यक है, बल्कि लंबे समय में त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकता है।”

    ब्यूटी इन्फ्लुएंसर्स और इंस्टाग्राम का प्रभाव

    सोशल मीडिया पर पहले और बाद की तस्वीरें, ‘ग्लो अप जर्नी’ की कहानियां, और “नो फिल्टर लुक” की रील्स ,इन सबका प्रभाव युवाओं के दिमाग पर इतना गहरा है कि वे बिना सोचे-समझे खुद को इस दौड़ में झोंक रहे हैं।अगर आप भी बोटॉक्स, फिलर या स्किन बूस्टर लेने की सोच रहे हैं, तो रुकिए सोचिए और फिर फैसला लीजिए।

    बोटॉक्स से पहले इन बातों का रखें ध्यान:

    एलर्जी टेस्ट करवाएं

    स्किन टाइप और मेडिकल हिस्ट्री की जांच जरूरी है

    ट्रीटमेंट केवल प्रमाणित डॉक्टर से ही करवाएं

    सोशल मीडिया से ज़्यादा अपने शरीर की सुनें

    बोटॉक्स और एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट्स ने स्किन केयर की दुनिया में नई क्रांति ला दी है। लेकिन हर चमक सोना नहीं होती। असली खूबसूरती इंस्टाग्राम लाइक्स से नहीं, स्वस्थ और सुरक्षित त्वचा से आती है।
    खुद को साबित करने के लिए नहीं, खुद से प्यार करने के लिए सही कदम उठाइए।

  • लालसा पर रखें काबू, वजन घटाएं आसान तरीकों से – जानें पोषण विशेषज्ञों के 3 टिप्स

    लालसा पर रखें काबू, वजन घटाएं आसान तरीकों से – जानें पोषण विशेषज्ञों के 3 टिप्स

    सोशल संवाद / डेस्क: वज़न कम करते हुए खाने की लालसा से जूझ रहे हैं? आसान आदतें मदद कर सकती हैं अगर खाने की लालसा अक्सर आपको अपने वज़न घटाने के सफ़र से विचलित करती है, तो आपके लिए अच्छी खबर है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ आसान रोज़मर्रा की आदतों को अपनाकर, आप अपनी लालसा को ज़्यादा प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं और अपने वज़न घटाने के लक्ष्यों को तेज़ी से हासिल कर सकते हैं।

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    इन आदतों में हाइड्रेटेड रहना, उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थ खाना, भोजन के बीच लंबे अंतराल से बचना और तनाव को नियंत्रित करना शामिल है। नियमितता और जागरूकता के साथ, आपका आदर्श वज़न हासिल करना आपके विचार से कहीं ज़्यादा आसान हो सकता है।

    जानिए वो 3 असरदार तरकीबें जो आपकी लालसा को नियंत्रित करेंगी:

    उच्च प्रोटीन आहार को प्राथमिकता दें

    • पोषण विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रोटीन युक्त भोजन आपको लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है और अस्वास्थ्यकर स्नैक्स खाने की इच्छा को कम करता है।
    • क्या खाएं: अंडे, दालें, पनीर, दही, टोफू, मूंगफली।

    पानी को अपना सबसे अच्छा दोस्त बनाएँ

    कई बार हमें जो भूख लगती है, वह असल में प्यास होती है। हर कुछ मिनट में पानी पीने से अनावश्यक खाना खाने की इच्छा कम होती है। सुझाव: रोज़ाना 8-10 गिलास पानी पीने का लक्ष्य रखें।

    ध्यान भटकाने की तकनीक अपनाएँ

    जब अचानक भूख लगे, तो 10 मिनट के लिए खुद को विचलित करें—टहलें, किताब पढ़ें, या किसी दोस्त को फ़ोन करें। अक्सर यह इच्छा अपने आप ही दूर हो जाती है।

    अतिरिक्त सलाह:

    वज़न कम करना नामुमकिन नहीं है—बस सही रणनीति और थोड़ी सी निरंतरता की ज़रूरत है। भूख को नियंत्रित करने के साथ-साथ, यहाँ कुछ अतिरिक्त विशेषज्ञ सुझाव दिए गए हैं जिनसे आप सही रास्ते पर बने रह सकते हैं:

    1. जंक फ़ूड की जगह हेल्दी स्नैक्स खाएँ

    बिना किसी अपराधबोध के भूख मिटाने के लिए मखाना, भुने हुए चने या मुट्ठी भर सूखे मेवे अपने पास रखें।

    2. अच्छी नींद को प्राथमिकता दें

    नींद की कमी खाने की लालसा को बढ़ा सकती है। हर रात 7-8 घंटे की आरामदायक नींद लेने का लक्ष्य रखें।

    3. खाने की डायरी रखें

    अपने खाने पर नज़र रखने से आपको अपने खाने के पैटर्न के बारे में ज़्यादा जानकारी मिलती है और नियंत्रण बनाए रखना आसान हो जाता है।

  • कहीं आप कॉफ़ी के नाम पर कॉकरोच तो नहीं पी रहे ; हो जाए सतर्क

    कहीं आप कॉफ़ी के नाम पर कॉकरोच तो नहीं पी रहे ; हो जाए सतर्क

    सोशल संवाद / डेस्क : कई साल पहले एनपीआर ने कीट विज्ञानी डॉ. डगलस एमलेन एक कहानी बताई जिसमे वह बताते है की जब वे एक प्रोफ़ेसर के साथ ताज़ी पिसी हुई साबुत कॉफ़ी बीन्स से बनी कॉफ़ी लेने के लिए अपनी सीमा से बहुत दूर तक गाड़ी चलाते थे, क्योंकि इस प्रोफ़ेसर को कैफ़ीन की लत थी और वे कॉफ़ी शॉप में पिसी हुई बीन्स से बनी कॉफ़ी ही पीने पर ज़ोर देते थे।

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    एमलेन इस बात पर बहुत चिढ़ते थे कि गाड़ी चलाकर वे कितना समय गँवाते हैं, उन्होंने पुछा प्रोफ़ेसर से तब प्रोफ़ेसर ने आखिरकार उन्हें बताया कि यह इतना ज़रूरी क्यों है। पता चला कि उन्हें कॉकरोच से एलर्जी थी, और पहले से पिसी हुई कॉफ़ी में पिसे हुए कॉकरोच होते हैं, जिससे जब भी वे इसे पीते थे तो उन्हें एलर्जी हो जाती थी।

    कॉफ़ी में कॉकरोच कैसे पहुँच जाते हैं?

    ज़ाहिर है, कॉफ़ी के साथ ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कॉफ़ी बीन्स के बड़े ढेर में कॉकरोच लग जाते हैं और एमलेन के अनुसार, उन्हें पूरी तरह से हटाना नामुमकिन है। इसलिए उन्हें कॉफ़ी बीन्स के साथ ही पीस दिया जाता है।

    कॉफ़ी (और अन्य खाद्य पदार्थों) में कीड़ों के अंशों को खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा अनुमति दी जाती है, उनकी मात्रा एक निश्चित प्रतिशत से ज़्यादा न हो; इस CNN रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 4% से 6% तक की मात्रा स्वीकार्य मानी जाती है।

    वास्तव में, FDA यह स्वीकार करता है कि “किसी मेज़बान उत्पाद में कीड़ों के किसी भी जीवित या मृत जीवन चक्र चरण की उपस्थिति (जैसे, टमाटर उत्पादों में मक्खी के अंडे और कीड़ा); या उनकी उपस्थिति के प्रमाण (जैसे, मल, छिलके, चबाए गए उत्पाद के अवशेष, मूत्र, आदि); या सक्रिय प्रजनन आबादी का निर्माण (जैसे, अनाज के भंडार में कृंतक)” पूर्व निर्धारित सीमाओं के भीतर स्वीकार्य है, क्योंकि ये “भोजन में प्राकृतिक या अपरिहार्य दोष” हैं जो मनुष्यों के लिए कोई स्वास्थ्य खतरा पैदा नहीं करते हैं।

    यहाँ बहुत कुछ समझने की बात है। एक ओर, अमेरिकी और यूरोपीय लोग कीड़ों से बहुत आसानी से घृणा करते हैं। यह तथ्य कि अन्य संस्कृतियाँ इन्हें बड़े चाव से खाती हैं और ये प्रोटीन और कुछ पोषक तत्वों का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं (कुछ लोग इन्हें “भविष्य का भोजन” कहते हैं), हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए कीड़ों को खाने से होने वाली घबराहट को कम नहीं कर पाता। हमारे आस-पास और हमारे खाने में अक्सर कीड़ों के अवशेष होते हैं जिनके बारे में हमें पता ही नहीं होता। एक संस्था, टेरो, का अनुमान है कि एक व्यक्ति सालाना 1,40,000 कीट अवशेष खा सकता है। शायद हमें इस तथ्य की आदत डालनी होगी कि कीड़े हमारी दुनिया और हमारी खाद्य प्रणाली का हिस्सा हैं।

    दूसरी ओर, यह जानना कि कॉकरोच को पीसकर कॉफ़ी बनाई जाती है, एक पसंदीदा पेय जिसे हम में से कई लोग हर दिन पीने के लिए उत्सुक रहते हैं, एक भयावह विचार है। जब एक ब्रिटिश चिकित्सक करण राज ने टिकटॉक पर कॉफ़ी में कॉकरोच होने के बारे में बताया, तो दर्शकों ने इस खुलासे पर गहरी प्रतिक्रिया व्यक्त की। एक व्यक्ति ने टिप्पणी की, “आप मुझे बता रहे हैं कि मैं वही चीज़ पी रहा हूँ जिससे मैं जीवन भर डरता रहा हूँ!??”
    अगर आपको यह पढ़ कर पिने का मन न करे तो आप खुद कॉफ़ी बीन खरीद कर उसे पिश कर पिए।

  • ये भूल से भी न खाए वरना हो सकता है आँखों को नुकसान

    ये भूल से भी न खाए वरना हो सकता है आँखों को नुकसान

    सोशल संवाद / डेस्क : हम जो कुछ खाते है तो सिर्फ शरीर को नहीं हमारे आँखों पर भी उतना ही असर पड़ता है। एसे में हमे थोडा सोच समझ कर खाना चाहिए। जेसे की आपको पता है, आज कल की व्यस्त जीवनशैली में हम अपनी आँखों की ठीक से देखभाल नहीं कर पाते, जिससे आँखों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गलत खान-पान की आदतें हमारी आँखों की रोशनी भी कमज़ोर कर सकती हैं। इससे आँखों की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

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    कुछ खाद्य पदार्थ आँखों को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं।इससे आँखों की रोशनी भी जा सकती है।
    आज के समय में हम अपनी सेहत का ठीक से ध्यान नहीं रख पाते। कई बार हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी आँखों का ध्यान रखना भूल जाते हैं। आँखें हमारे शरीर का एक नाज़ुक अंग हैं। लेकिन इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम घंटों मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन पर बिताते हैं। इसका हमारी आँखों पर बुरा असर पड़ रहा है।

    इसके साथ ही, गलत खान-पान का असर भी हमारी आँखों पर तेज़ी से पड़ता है। अक्सर लोग आँखों की देखभाल को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, खासकर जब बात खाने की हो। हम जो भी खाते हैं, उसका सीधा असर हमारे शरीर के अंगों पर पड़ता है। इसमें आँखें भी शामिल हैं। कई बार हम रोज़ाना ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं जिनसे धीरे-धीरे आँखों की रोशनी कमज़ोर होने लगती है। ख़ासकर जंक फ़ूड, ज़्यादा मीठा या तला हुआ खाना, न सिर्फ़ शरीर को नुकसान पहुँचाता है बल्कि आँखों की सेहत के लिए भी ख़तरनाक साबित हो सकता है।

    मैदे से बनी ब्रेड और पास्ता

    मैदा न सिर्फ़ हमारी सेहत को नुकसान पहुँचाता है बल्कि हमारी आँखों की सेहत के लिए भी अच्छा नहीं है। हम रोज़ाना ब्रेड खाते हैं। इससे पास्ता भी बनाया जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट भी होते हैं जो आसानी से पच जाते हैं। ऐसे में इसमें मौजूद ब्लड शुगर तेज़ी से बढ़ता है। इससे हमारी आँखों को नुकसान पहुँचता है। आप सूजी से बनी ब्राउन ब्रेड या पास्ता खा सकते हैं।

    जंक फ़ूड आँखों के लिए सबसे खराब खाद्य पदार्थों की सूची में शामिल है। इसमें मौजूद तेल न सिर्फ़ सेहत को नुकसान पहुँचाता है बल्कि आँखों के लिए भी हानिकारक होता है। आपको बता दें कि जंक फ़ूड कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं। ऐसे में धमनियाँ ब्लॉक हो जाती हैं। इससे स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही आँखों की रोशनी भी जा सकती है।

  • क्या रात को बार-बार नींद टूटना किसी चीज का है इशारा, जानिए इससे जुडी बाते

    क्या रात को बार-बार नींद टूटना किसी चीज का है इशारा, जानिए इससे जुडी बाते

    अगर आपको रात में नींद बार बार टूट जाती है तो मन में कई सवाल आते है की मुझे कुछ बीमारी तो नही। चलिए आपको बताते है इससे जुडी बाते और एसा क्यों होता है।

    रात में खाने-पीने के बाद, फ़ोन एक तरफ रख कर सो गये, तुरंत नींद भी आ गई। पर कुछ घंटों बाद आप उठे जाते है। जब आपने बाहर देखा, तो अँधेरा था। घड़ी में रात के 2:30 बज रहे थे। आप करवट बदलते हैं और फिर से सोने की कोशिश करते हैं। इस बार भी आपको नींद आ जाती है। लेकिन कुछ घंटों बाद, आप फिर से जाग जाते हैं। घड़ी में सुबह के 4 बज रहे थे। अब, आपको नींद नहीं आ रही है।

    क्या आपके साथ ऐसा रोज़ होता है?

    रात में नींद टूटने के कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण है बहुत ज़्यादा तनाव। जब व्यक्ति लगातार कुछ न कुछ सोचता रहता है, तो उसके दिमाग में बातें चलती रहती हैं। जब वह तनाव में होता है, तो दिमाग पूरी तरह से शांत नहीं हो पाता। ऐसे में नींद आती तो है, लेकिन बार-बार टूट जाती है।

    दूसरा कारण है नींद से जुड़ी बीमारियाँ। जैसे स्लीप एपनिया। इसमें सोते समय व्यक्ति की साँसें रुक जाती हैं। ऐसा रात में कई बार हो सकता है। जिससे नींद खुल जाती है। देखिए, स्लीप एपनिया एक गंभीर स्थिति है। इससे पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए, अगर आप नींद से हांफते हुए उठते हैं या आपकी साँस फूलती है, तो इसे गंभीरता से लें। सोते समय घुटन महसूस होना या बहुत खर्राटे लेना भी स्लीप एपनिया के लक्षण हैं। इसलिए डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें।

    नींद में बार-बार रुकावट आने का तीसरा कारण है सोने से पहले कैफीन या निकोटीन युक्त चीज़ें पीना। जैसे चाय, कॉफ़ी, सिगरेट वगैरह। कैफीन और निकोटीन दिमाग़ को अलर्ट कर देते हैं। जिससे नींद देर से आती है। अगर आती भी है, तो हर कुछ मिनट में टूट जाती है।

    चौथा कारण है देर रात खाना। अगर आप खाने के तुरंत बाद सो जाते हैं, तो शरीर खाना ठीक से पचा नहीं पाता। इससे एसिडिटी हो सकती है और आपकी नींद बार-बार टूट सकती है।

    पाँचवाँ कारण है बार-बार पेशाब आना। अगर आप रात को सोने से पहले बहुत ज़्यादा पानी पीते हैं या मूत्राशय से जुड़ी कोई समस्या है, तो आपको रात में कई बार पेशाब आने की इच्छा होती है। इससे आपकी नींद में खलल पड़ता है।

    छठा कारण है आपका सोने का समय। अगर आपने अपने सोने का समय तय नहीं किया है। या आप सोने से पहले फ़ोन या लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे शरीर की जैविक घड़ी गड़बड़ा जाती है। जिससे नींद आने में दिक्कत होती है। अगर किसी तरह नींद आ भी जाए, तो गहरी नींद नहीं आ पाती।

    अगर आप अच्छी और गहरी नींद चाहते हैं, तो सबसे पहले सोने और जागने का समय तय करें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले फ़ोन या लैपटॉप का इस्तेमाल न करें। इसकी जगह आप कोई किताब पढ़ सकते हैं। साथ ही, रात में जल्दी खाना खाएँ ताकि उसे पचने का समय मिले। सोने से पहले कैफीन युक्त चीज़ें पीने से बचें। अगर तनाव बहुत ज़्यादा है, तो उसे कम करें। इसके लिए अपने मन की बात और तनाव अपने परिवार और दोस्तों के साथ साझा करें। तनाव से निपटने के लिए आप पेशेवर मदद भी ले सकते हैं। वहीं, अगर नींद से जुड़ी कोई बीमारी है, तो डॉक्टर से सलाह लें और इलाज करवाएँ।