सोशल संवाद / बड़बिल : सुंदरगढ़ जिले के कोइड़ा और केंद्रापड़ा नहीं, बल्कि केंदुझर जिले के जोड़ा क्षेत्र के हजारों लोगों के लिए सोना नदी केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवनरेखा है। वर्षों से यह नदी किसानों की खेती को सींचती रही है, जंगलों को हरा-भरा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार बनी हुई है।

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लेकिन आज यही सोना नदी अपनी पीड़ा खुद बयां कर रही है। खनन क्षेत्रों और कल-कारखानों से निकलने वाला लाल और मटमैला दूषित पानी लगातार नदी में मिल रहा है। बारिश के मौसम में नदी का स्वच्छ जल पूरी तरह प्रदूषित हो जाता है। निर्मल जलधारा की जगह मिट्टी, लौह अयस्क के अवशेष और औद्योगिक कचरे से भरा पानी बहता दिखाई देता है। यह दृश्य केवल पर्यावरण प्रदूषण की नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीनता की भी कहानी कहता है।
यदि समय रहते इस गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका सीधा असर खेती, पेयजल, जलीय जीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा। प्रदूषित जल से कृषि भूमि की उर्वरता प्रभावित हो सकती है, मछलियों और अन्य जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है तथा नदी पर निर्भर ग्रामीणों के सामने जल संकट और गहरा सकता है।
निस्संदेह, खनन उद्योग क्षेत्र के विकास और रोजगार के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास की कीमत प्रकृति का विनाश नहीं हो सकती। खनन कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन करें, गादयुक्त और दूषित पानी का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करें तथा बिना उपचार (ट्रीटमेंट) के किसी भी औद्योगिक अपशिष्ट को नदी में न जाने दें।
सरकारी विभागों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्थानीय प्रशासन, खनन कंपनियों और आम नागरिकों—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि सोना नदी को बचाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं। नदी के जल की नियमित जांच, प्रदूषण की सतत निगरानी और आधुनिक जल उपचार प्रणाली को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
यदि आज हम सोना नदी की इस मौन पुकार को अनसुना करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। जिस नदी ने सदियों से हमें जीवन दिया है, आज उसके अस्तित्व की रक्षा करना हमारा नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्व है।
आइए, हम सभी संकल्प लें कि सोना नदी को स्वच्छ, निर्मल और जीवंत बनाए रखेंगे। क्योंकि नदी बचेगी, तभी प्रकृति बचेगी, और प्रकृति बचेगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।









