April 17, 2024 6:43 pm
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रातोरात बना महादेव का विशाल मंदिर, एक ही पत्थर से बना है शिवलिंग

Xavier Public School april

सोशल संवाद/ डेस्क (रिपोर्ट :तमिश्री )- मनुष्य हमेशा से ही अबूझ पहेलियों तथा रहस्यों को जानने के लिए उत्सुक रहा है, किसी भी अधूरी कहानी या अधूरे निर्माण को देख उत्सुकता कई बार आकर्षण में बदल जाती है। ऐसा ही एक रहस्यमय और अद्भुत निर्माण है मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर दूर भोजपुर (रायसेन जिला) में । यहां भोजपुर की पहाड़ी पर एक अद्भुत और विशाल, परंतु अधूरा शिव मंदिर है। यह भोजपुर शिव मंदिर या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई-1055 ई) द्वारा किया गया था। मंदिर करीब 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। मंदिर 115 फीट (35 मी॰) लंबे, 82 फीट (25 मी॰) चौड़े तथा 13 फीट (4 मी॰) ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है यहां का विशाल शिवलिंग, अपने-आप में अनूठे और विशाल आकार वाले इस शिवलिंग के कारण भोजेश्वर मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ भी कहा जाता है। चिकने लाल बलुआ पाषाण के बने इस शिवलिंग को एक ही पत्थर से बनाया गया है और यह विश्व का सबसे बड़ा प्राचीन शिवलिंग माना जाता है। भोले बाबा का ये धाम बेतवा नदी के किनारे एक पहाड़ी पर मौजूद है । 

आधार सहित शिवलिंग की कुल ऊंचाई 40 फीट (12 मी॰) से अधिक है। शिवलिंग की लंबाई इसकी ऊंचाई 7.5 फीट (2.3 मी॰) तथा व्यास 5.8 फीट (2 मी॰) है। यह शिवलिंग एक 21.5 फीट (6.6 मी॰) चौड़े वर्गाकार आधार (जलहरी) पर स्थापित है। मंदिर से प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा में सीढ़ियां हैं। गर्भगृह के दरवाजों के दोनों ओर नदी देवी गंगा और यमुना की मूर्तियां लगी हुई हैं।

इसके साथ ही गर्भगृह के विशाल शीर्ष स्तंभ पर भगवानों के जोड़े – शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सरस्वती, राम-सीता एवं विष्णु-लक्ष्मी की मूर्तियां स्थापित हैं। सामने की दीवार के अलावा बाकी सभी तीन दीवारों में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं हैं। मंदिर के बाहरी दीवार पर यक्षों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।

इसका विशाल प्रवेशद्वार का आकार-प्रकार वर्तमान में भारत के किसी भी मंदिर के प्रवेशद्वारों में सर्वाधिक विशाल है। इसके अंदर स्थापित शिवलिंग को देख, प्रवेशद्वार का यह आकार प्रासंगिक लगता है। इस मंदिर की एक अन्य विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है। 

साथ ही भोजेश्वर मंदिर की छत गुम्बदाकार हैं। कुछ विद्धान इसे भारत की प्रथम गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं।

भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है। इस जगह की एक अद्भुत विशेषता यह भी है कि भोजेश्वर मंदिर के भूविन्यास, स्तंभ, शिखर, कलश व अन्य रेखांकन चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण किए हुए हैं।   आस-पास नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की अद्भुत योजना थी।  इतने स्पष्ट नक्शे और योजना को देख प्रतीत होता है कि यह निर्माण स्थल समकालीन शिल्पज्ञों, वास्तुकारों और अभियांत्रिकों के लिए एक महा-विद्यालय जैसा था।   यहां एक वृहत मन्दिर परिसर बनाने की योजना थी, जिसमें ढेरों अन्य मन्दिर भी बनाये जाने थे। वास्तुविद मानते हैं कि यदि यह योजना सफलतापूर्वक सम्पन्न होती तो यह मन्दिर परिसर भारत के सबसे बड़े मन्दिर परिसरों में से एक होता।

पुरानी लोक कथा की माने तो होशंगाबाद के सुल्तान होशंग शाह ने राजा भोज के इलाके में आक्रमण कर दिया था जब यह मंदिर बनाया जा रहा था। इसी युद्ध के कारण इस मंदिर का काम पूरा नहीं हो पाया। इस मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह से किया जा रहा था ताकि यह सदियों तक चलता रहे और यही एक वजह है कि यह मंदिर 1000 साल से ऐसे ही खड़ा है।

इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है और आश्चर्य भी होता है कि आखिर इतने भारी पत्थर, इतनी ऊंचाई पर कैसे पहुंचाए गए होंगे? परंतु मंदिर के ठीक पीछे के भाग में एक ढलान बना है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने के लिए किया गया था। 

यहां उल्लेखनीय है कि पूरे विश्व में कहीं भी निर्माण हेतु सामग्री को संरचना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक अब दिखाई नहीं देती। भोजेश्वर मंदिर में इसे प्रत्यक्ष प्रमाण के तौर पर देखा जा सकता है कि आखिर कैसे 70 टन भार वाले विशाल पत्थरों को मंदिर के शीर्ष तक पहुंचाया गया।

कुछ विद्वानों का ये भी मानना है वनवास के समय इस शिव मंदिर को पांडवों ने बनवाया था। भीम घुटनों के बल पर बैठकर इस शिवलिंग पर फूल चढाते थे। इस मंदिर का निर्माण द्वापर युग में पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए इस शिवलिंग का निर्माण एक ही रात में किया गया था। जैसे ही सुबह हुई तो पांडव लुप्त हो गए और मन्दिर अधूरा ही रह गया।

यह मन्दिर ऐतिहासिक स्मारक के रूप में भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण के अधीन है। मन्दिर के निकट ही इस मन्दिर को समर्पित एक पुरातत्त्व संग्रहालय भी बना है।

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