May 19, 2024 5:11 am
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इस सावन दर्शन करे त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की, होगा हर दुःख का नाश

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सोशल संवाद डेस्क / ( रिपोर्ट :तमिश्री )- श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर नासिक जिले में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के उन 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिन्हें भारत में सबसे अधिक पूजा जाता है। मंदिर के पास ब्रह्मगिरि नमक पर्वत से पुण्यसलिला गोदावरी नदी निकलती है।  गोदावरी का प्रवाह  गौतम ऋषि के कठोर तपस्या का फल है. शिवपुराण में वर्णन हैं कि गौतम ऋषि तथा गोदावरी और सभी देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने इस स्थान पर निवास करने निश्चय किया और त्र्यंबकेश्वर नाम से विख्यात हुए।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग सबसे अद्भुत और मुख्य बात यह हैं कि इसके तीन मुख (सिर) हैं, जिन्हें एक भगवान ब्रह्मा, एक भगवान विष्णु और एक भगवान रूद्र का रूप माना जाता है। इस लिंग के चारों ओर एक रत्न जड़ित मुकुट रखा गया है, जिसे त्रिदेव के मुखोटे के रुप में माना गया है। इस मुकुट में हीरा, पन्ना और कई बेशकीमती रत्न लगे हुए हैं। त्र्यंबकेश्वर मंदिर में इसको सिर्फ सोमवार के दिन शाम 4 से 5 बजे तक दर्शनार्थियों को दिखाया जाता है। गोदावरी नदी के किनारे बने त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण काले पत्थरों से किया गया है।

इस मंदिर की वास्तुकला बहुत ही अद्भुत और अनोखी है। भव्य त्र्यंबकेश्वर मंदिर इमारत सिंधु आर्यशैली का अद्भुत नमूना है। इस मंदिर के भीतर एक गर्भगृह है, जिसमें प्रवेश करने के पश्चात् शिवलिंग आंख के समान दिखाई देता हैं, जिसमें जल भरा रहता हैं। यदि ध्यान से देखा जाए तो इसके भीतर एक इंच के तीन लिंग दिखाई देते हैं। इन तीनो लिंगो को त्रिदेव यानि  ब्रह्मा, विष्णु, महेश का अवतार माना जाता है। इस मंदिर में कालसर्प दोष की शांति वैदिक पंडितों के द्वारा करवाई जाती हैं।

यहां प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन समय में ब्रह्मगिरी पर्वत पर देवी अहिल्या के पति ऋषि गौतम रहते थे और तपस्या करते थे। क्षेत्र में कई ऐसे ऋषि थे जो गौतम ऋषि से ईर्ष्या करते थे और उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते थे। एक बार सभी ऋषियों ने गौतम ऋषि पर गौहत्या का आरोप लगा दिया। सभी ने कहा कि इस हत्या के पाप के प्रायश्चित में देवी गंगा को यहां लेकर आना होगा। तब गौतम ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना करके पूजा शुरू कर दी। ऋषि की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी और माता पार्वती वहां प्रकट हुए। और वरदान मांगने को कहा। तब ऋषि गौतम से शिवजी से देवी गंगा को उस स्थान पर भेजने का वरदान मांगा। देवी गंगा ने कहा कि यदि शिवजी भी इस स्थान पर रहेंगे, तभी वह भी यहां रहेगी। गंगा के ऐसा कहने पर शिवजी वहां त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में वास करने को तैयार हो गए और गंगा नदी गौतमी के रूप में वहां बहने लगी। गौतमी नदी का एक नाम गोदवरी भी है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर के पास तीन पर्वत स्थित हैं, जिन्हें ब्रह्मगिरी, नीलगिरी और गंगा द्वार के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मगिरी को शिव स्वरूप माना जाता है। नीलगिरी पर्वत पर नीलाम्बिका देवी और दत्तात्रेय गुरु का मंदिर है। गंगा द्वार पर्वत पर देवी गोदावरी यां गंगा का मंदिर है। मूर्ति के चरणों से बूंद-बूंद करके जल टपकता रहता है, जो कि पास के एक कुंड में जमा होता है।

ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि भगवान शिव को समर्पित इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजीराव  ने एक शर्त पर करवाया था। शर्त यह थी कि यहाँ स्थापित ज्योतिर्लिंग का पत्थर अंदर से खोखला है या फिर नहीं। परन्तु पेशवा नानासाहेब अपनी शर्त हार गए। इसके बाद उन्होंने इस मंदिर का निर्माण भव्य तरीके से वर्ष 1755 से 1786 के मध्य में करवाया। उन्होंने यहाँ विराजित भगवान शिव की प्रतिमा को नासक डायमंड से निर्मित करवाया। परन्तु दुर्भाग्यवश एंग्लो-मराठा युद्ध के दौरान अंग्रेजो ने यहाँ के डायमंड को लूट लिया था। मंदिर  काले पत्थरों से निर्मित किया गया है जो इसकी स्थापत्य कला को एक सुन्दर रूप प्रदान करता है। मंदिर की दीवारों पर सुन्दर नक्काशी बनी हुई है, यह सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर में चारो तरफ दरवाजे बने हुए हैं जिनमें से पश्चिम की ओर वाला दरवाजा विशेष तीज-त्यौहार के मौका पर ही खुलता है। वहीँ मंदिर की पूर्व दिशा की ओर एक चौकोर मंडप बना हुआ है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर के परिसर मे एक  पवित्र तालाब है जिसे कुशावर्त  कहते है। कुशावर्त तीर्थ   मंदिर से ४०० मीटर की दूरी पर स्थित है| वह १७५० मे बनाया गया २१ फ़ीट गहरा कुंड है। कुशावर्त तीर्थ यह प्राचीन तर्थिस्थल है। ब्रह्मगिरी पर्वतसे उद्गम होकर निकली हुओ गोदावरी नदी गंगाद्वार पर्वतसे होकर आगे कुशावर्त कुंड के माध्यमसे भाविकोंको दर्शन तथा तीर्थस्थान का पुण्य देती है।
सिंहस्थ कुंभमेला इसी कुशावर्त तीर्थपर संपन्न होता है। त्र्यंबकेश्वर नगरी में होनेवाले सभी धार्मिक पूजा विधीयोंके दरम्यान इस कुंड में स्नान की परंपरा है। कहा जाता है कि त्र्यंबकेश्वर मंदिर बहुत सी घटनाओ की साक्षी है ।जैसे भगवान राम उनके पिता राजा दशरथ का श्राद्ध करने के लिए यहाँ आये थे| गौतम ऋषि ने कुशावर्त कुंड मे पवित्र स्नान किया था।

मंदिर की शुरुआत मे, एक सफेद संगमरमर से बना नंदी है| यह नंदी भगवान शिव शंकर का वाहन है। ऐसा माना जाता है कि, यदि कोई नंदी के कान मे अपनी इच्छा / आकांक्षा बताता है, तो वह उसे भगवान शिव को बताते है| जिससे अपनी इच्छा जल्दी से पूरी होती है। नंदी मंदिर के बाद सभा मंडप  आता है,और फिर मुख्य मंदिर अंत मे है जहाँ लिंग स्थित है।

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